मुझे पता है हर शाम तो नहीं
मगर कभी किसी शाम
जब तनहा बैठोगे
शायद मुझे याद करोगे
की कोई एक था
जिसने रातें काटी रात भर जलकर
सुबह कभी देखी नहीं
क्योंकि सुबह तक जल जल कर
बुझ जाती थी आँखें
जिसने भीड़ में भी तनहा दिन काटे
तुम्हारी एक नज़र के सहारे
जिसने खामोश रहकर सिर्फ तुम्हें देखा
उन काले सफ़ेद पन्नो को नहीं
जिनमें रंग नहीं थे तुम्हारी बातों के
मुझे पता है रोज़ तो नहीं
मगर कभी किसी रोज़
जब कुछ भी न होगा सोचने को
शायद सोचोगे मेरे बारे में
की कोई एक था
जिसकी मुस्कराहट आती थी
तुम्हारी हंसी से
जिसे शोर में भी
सुनाई देती थी तो बस
तुम्हारी ही बातें
जिसने धागे से बाँध कर उड़ाए थे
अपने शब्द
और लटाई थमा दी तुम्हारे हाथों में
मुझे पता है कभी नहीं
फिर भी सोचता हूँ शायद कभी
आ जाऊं तुम्हारी नींद में
किसी बुरे ख़ाब के बीच में
तब शायद तुम्हें यकीन हो
की कोई था
जो कुछ पल साथ तो था मगर
खो गयी उसकी आवाज़ें
तुम्हारी हँसी के शोर में
ये सब होगा नहीं कभी
मुझे पता है
मगर फिर भी सोचता हूँ
शायद कभी.......
मगर कभी किसी शाम
जब तनहा बैठोगे
शायद मुझे याद करोगे
की कोई एक था
जिसने रातें काटी रात भर जलकर
सुबह कभी देखी नहीं
क्योंकि सुबह तक जल जल कर
बुझ जाती थी आँखें
जिसने भीड़ में भी तनहा दिन काटे
तुम्हारी एक नज़र के सहारे
जिसने खामोश रहकर सिर्फ तुम्हें देखा
उन काले सफ़ेद पन्नो को नहीं
जिनमें रंग नहीं थे तुम्हारी बातों के
मुझे पता है रोज़ तो नहीं
मगर कभी किसी रोज़
जब कुछ भी न होगा सोचने को
शायद सोचोगे मेरे बारे में
की कोई एक था
जिसकी मुस्कराहट आती थी
तुम्हारी हंसी से
जिसे शोर में भी
सुनाई देती थी तो बस
तुम्हारी ही बातें
जिसने धागे से बाँध कर उड़ाए थे
अपने शब्द
और लटाई थमा दी तुम्हारे हाथों में
मुझे पता है कभी नहीं
फिर भी सोचता हूँ शायद कभी
आ जाऊं तुम्हारी नींद में
किसी बुरे ख़ाब के बीच में
तब शायद तुम्हें यकीन हो
की कोई था
जो कुछ पल साथ तो था मगर
खो गयी उसकी आवाज़ें
तुम्हारी हँसी के शोर में
ये सब होगा नहीं कभी
मुझे पता है
मगर फिर भी सोचता हूँ
शायद कभी.......
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