About Me

I am not just what I am.Most of the times I am someone else and rest of the times I pretend to be myself.It is impossible for me to find whether I am someone else or I am pretending to be myself.some people think what they want to think about me and some people think what I want them to think about me.But no one thinks about who really I am.Not even myself.I am a nonconformist and love to be dramatic.......(aisa hi kuchh likhte hain na?) wah!!!kya likha hai...

Friday, November 13, 2009

आवाजें

कभी चीखती चिल्लाती
बाज़ार में खोये बच्चे की तरह
किसी को तलाशती
कभी धीमी सहमी सी
रात को निकले चोर के
कदमो की आहट की तरह
कभी पवनचक्की की
आवाज़ की तरह रुक रुक कर आती
कभी हारे हुए जुआरी की तरह
झुंझलाई हुई दबी सी
कभी शराबी की तरह
टूटती हुई लडखडाती सी
कभी हक जमाती हुई
मकान मालिक के जैसी
कभी छत से टपकते
पानी की बूंदों सी
मैंने देखा है तुम्हारी सारी आवाज़ों को
मेरे कमरे की बंद खिड़की के कांच से
टकराकर वापस जाते हुए

Sunday, November 8, 2009

आओ हवा दें

आओ थोडी हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे
शुरूआत हुई थी
इस लडाई की
आओ आज फ़िर
किसी मासूम हाथ में
तलवार दें
आओ आज किसी
दुल्हन की मेहंदी को
बदल दें खून के
लाल रंग में
आओ आज फ़िर
वो बनिए की दुकान
लुट लें जो अपनी
बेटी से बात नहीं करने देता
चलो सब साथ
एक साथ आवाज़ बुलंद करें
उस कातिल को
बचाने के लिए
जिसको फांसी हुई है
आओ आज और
घी डालें
उस नफरत
की आग में
बिना इसके
नतीजा नहीं निकल
पायेगा इस लडाई का


तो आओ आज फ़िर
हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई
इस लडाई की
इसी बहाने
पड़ताल तो हो जायेगी
उन रंजिशों की
जो वजह हैं
इस लडाई की

कुछ तो है एक जैसा

राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है,
लोग लाश लेकर जा रहे थे
भीड़ अच्छी थी
बूढा चौकीदार जो मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था
लाश को एक टक देख रहा था
मैं सोच में पड़ गया की वो क्या सोच रहा है
सोच रहा होगा की
उसका वक्त भी आनेवाला ही होगा
फ़िर उसकी आंखों में
शायद मैंने कुछ बूँदें देखी थी आँसू की
ये डर मौत का नहीं था
डर शायद ये था की
उसकी अन्तिम यात्रा में लोग होंगे की नहीं
राम नाम लेने वाले
उसके जाने के बाद रोने वाले
मरने के बाद ही सही
उसकी तारीफ़ करने वाले
उसकी आंखों में अब बेचैनी गई थी
मैं आगे बढ़ गया
आगे मैंने जिसको भी देखा
बड़ी गाड़ी में बैठे सज्जन, रिक्शेवाला, कॉलेज जाते लड़के
पानवाला, पुलिसवाला, अमीर, गरीब
सबकी आंखों में वही डर वही बेचैनी दिखी
आइना देखा तो वहां भी वही आँखें थी
वैसे ही डरी बेचैन
सोच कर खुश हुआ की
कुछ तो एक जैसा है हम इंसानों में आज भी

Tuesday, November 3, 2009

पागल ने लिखा था ....

भूखे रोटी को रोते हैं
जिनके पेट भरे हैं वो इंक़लाब की बातें करते हैं
तलवारें निकल गई हैं सबकी
काटेंगे किसको पता नहीं उनको
कौन है गुनहगार
आज जिनके घर में रौशनी है
वो अंधेरे की दलाली करते हैं
दुनिया को एक करने की लडाई
वो जीत गए हैं
फासला कम हो गया है
चोर और पुलिस के बीच का
घर और बाज़ार के बीच का
पहले परेशां रहते थे गर
बाज़ार में घर हो
आज खुश रहते हैं घरों में बाज़ार खुल गए हैं
समाज को बदल सकने वाले
कामयाब हो गए ख़ुद को बदलने में
भूखे दुखी हैं इसलिए नहीं की
आजकल काम नहीं मिलता
इसलिए की आजकल लोग काम देने की बातें करते हैं
भीख देते नहीं आसानी से
सड़कें आज पक्की हो गई हैं
सारे दलदल ऊँची इमारतों में रहते हैं आजकल
बड़े बुजुर्ग कहते हैं ज़माना बदल गया है
गुजरा वक्त तो मैंने देखा नहीं
हाँ मगर किसी पागल की एक किताब पढ़ी थी
लिखा था उस वक्त भी सब कुछ ऐसा ही था
सब कुछ ऐसा ही था
और उस ज़माने में भी उसे पागल ही कहते थे


Sunday, November 1, 2009

उमर क़ैद

जिस तालीम की इज़ाद की गई थी
लोगों की आज़ादी के लिए
उसी तालीम ने मुझे उमर क़ैद की सज़ा सुनाई है
गुनाह इतना है की
मैंने ऐतबार किया उनकी किताबों पर
और उन किताबों ने ला खड़ा किया
मुझे इस बाज़ार में
अब उम्र
भर इस बाज़ार की दीवारों को
नाखूनों से नोचता रहूँगा
मगर बाहर जा सकूँगा
कान झाकेंगे उन दीवारों के पार
किसी की आवाज़ सुनने को
मगर सुनाई देंगी सिर्फ़
हाथ में थमे फावडों की खनखन
वक्त गुज़रेगा लड़ते हुए उन फेंके हुए
मांस के टुकडों को झपटने के लिए
आँखें रंग पहचानना भूल जाएँगी
और ताकेंगी सिर्फ़ सफ़ेद आसमान को
इस इंतज़ार में की कब खुदा नीचे आए और कहे
चल तेरी ज़मानत हो गई है

Monday, October 26, 2009

चोर

हाँ उसी मीना बाज़ार में
झुमके की दुकानों पे भाग रहा हूँ
तुम्हारी हँसी की आवाजों को
सहेजने की कोशिश में
भेस बदल बदल कर
जाता हूँ हर बार वहीँ
तुमने हँसते हुए
ख़ुद को देखा था जिनमें
उन आइनों को खरीदने की कोशिश में
वो चौकीदार मुझे चोर समझता है
उसे भी क्या पता
की मैं आता हूँ अपना ही कुछ
सामान समेटने की कोशिश में

Sunday, October 4, 2009

खूबसूरत मोरनी

सुना है की
मोरनी बदसूरत होती है
और मोर खूबसूरत
मगर नाचता मोर है
मोरनी के इशारों पर
सोच ही रहा था की अगर
मोरनी खूबसूरत होती
तो मोर का क्या होता
तभी पीछे से आवाज़ आई
एक पैर पर नाचो
और मैं नाचने लगा

फूल और कांटे पार्ट 2

तुम्हारे जाने के बाद भी
मैं रोज़ उसी तरह
वो बैंगनी फूल लेकर
वहां आता था
अकेला बैठता ऊँघता रहता था
सारे पंछी मुझपर हँसते थे
हवाएं नाराज़ होकर
मुझे ठोकर मारती थीं
मुझे भगाने के लिए सूरज
अपनी धूप और तेज़ कर देता
फ़िर वो ही थक कर लौट जाता था
कभी चाँद मुझे डराने के लिए
बादलों के पीछे छिप जाता था
एक बार गुस्से में मैंने
चाकू से कांटे निकलने की
कोशिश भी की थी
कांटे तो अब भी वहीँ धंसे हैं
मगर हाथों की लकीरें
कुछ बदल सी गई हैं

परियों की कहानी

माँ मुझे याद नहीं
की तुमने बचपन में
मुझे कहानीयां सुनाई थी या नहीं
पर इस बार घर आकर तुमसे
सुनूंगा कहानियाँ
परियों की
शायद तुम्हारी कहानी की परियाँ
कुछ अलग हो
उन्हें प्यार करना आता हो
शायद उन्हें भावनाओं की समझ हो
मैं जानता हूँ माँ
तुम मेरा दिल नहीं तोड़ सकती

कल रात

सितारों ने टिमटिमा के
रात भर सोने नहीं दिया
चाँद भी रुंधे गले से
आवाज़ लगता रहा मुझे
आसमान भी रोया है
कल रात भर
सुना है कहीं बाढ़ आई है

उड़ती कहानी

कल रात अपनी कहानी को पंख लगाया था
उड़ाने की कोशिश कर रहा था
मगर वो नहीं उड़ी
मैंने उसके पंख उतार के
वापस दराज में रख दिए
फ़िर जैसे ही तुमने कहा
अपनी कहानी सुनाओ
वो उड़ गई
बिना पंखों के
आज सुबह दिखी थी मुझे
तुम्हारी मुंडेर पे
मुझे देख कर इतरा रही थी
या शायद पहचानने की कोशिश
मैंने भी झुंझलाकर उसे पत्थर मारा
वो आसमान में पड़ा सुराख़
दिखेगा तुम्हें रात को
कहानी मिल जाए तो मुझे
दे जाना
पिंजरे में रखूँगा उसको

रिक्शेवाला और पुलिसवाला

रिक्शेवाला रात को सुनसान सड़क पे
नशे में हल्ला मचा रहा था
कहीं से एक पुलिसवाला आया
वो भी नशे में
उसे मारने और चिल्लाने लगा
रिक्शेवाले ने रोते हुए धीरे से कहा
साहब अपनी कमाई के पैसों
की पीकर चिल्ला रहा हूँ
पुलिसवाले ने चुप होकर उसे और मारा

कफ़न अपना अपना

ख़बर आई थी की पड़ोसी का बेटा
शहीद हुआ है सीमा पर
और दूसरी ख़बर भी थी
की काम वाली बाई का बेटा
सेना की ट्रक के नीचे आकर मर गया
पहले की लाश आई तिरंगे में लिपटी
और दुसरे की पड़ी है
अभी तक सड़क पर
पुलिस हाथ नहीं लगाने देती

विधवा का इन्तेकाम

उसने अपने पति की लाश देखी
फ़िर अपने बच्चों की तरफ़
रोती हुई बच्ची को एक
ज़ोर का थप्पड़ लगाया
और चिल्लाई
'सब क्यों नहीं मर गए इसी के साथ'

परछाईं का बदला

सुबह की धुप से बनती परछाईं
मुझे डरा रह थी
रात को तो ये मेरी हमसफ़र थी
जब मैं अकेला था
ये गई नहीं थी
जब मैंने इसे लात मारी थी
कल रात तो खूब खेली थी मेरे साथ
कभी कुत्ता बनती कभी चिड़िया
अब दिन में ये औरों जैसी क्यों दिख रही है
शायद कल की लात का दर्द गया नहीं
बदला ले रही है मुझसे

फूल और कांटे

वो बैंगनी फूल जो मैं रोज़ तुम्हारे
बालों में लगाया करता था
वो फूल जिसे लेने मैं
रोज़ चार मील चलकर
रेलवे लाइन के उस पार जाता था
वही फूल जो मुरझाएं
ये सोचकर
उन्हें पानी की बोतल में रख कर लाता था
जिन्हें देख कर तुम हंसती थी
बच्चों की तरह

उसके कांटे निकाल नहीं पाया
आजतक अपने हाथों से
वहीँ धंसे पड़े हैं