मेरे अन्दर जो रहता है एक शख्श
उसे शौक है इन्कलाब लाने का
चाहता है की मैं भी उसकी तरह बन जाऊं
मगर मैं उसकी तरह विचार नहीं खाता
मुझे भूख लगती है
वो चाहता है की मैं उसके इशारों पे चलूँ
ग़ुलाम बन जाऊं उसका
मगर मैं तो पहले से ही जकड़ा हूँ बेड़ियों में
वो मुझे खोल नहीं सकता
क्योंकि उसके तो हाथ ही नहीं
उसे तो जरूरत होती है मेरे हाथों की
जिन्हें मैं कब का काट चुका हूँ
वो चाहता है की मेरे गले से भी गीत निकले
लोगों को जगाने वाले, क्रांति के,प्यार के
मगर मेरे गले का रास्ता तो
मेरी डरी सहमी आवाज़ ने हथिया रखा है
मैं कैसे उसे समझाऊं की
नहीं बन सकता मैं उसकी तरह
अब जब मुझे उसकी आवाजा तंग करती है
उसे सुला देता हूँ शराब पिला के
Tuesday, February 2, 2010
Monday, February 1, 2010
सच कहता हूँ
तुम गए तो गए
मुझे कोई ग़म नहीं
मेरा क्या ले गए तुम
हाँ मगर वो झील के किनारे
चने बेचनेवाला पूछ रहा था तुमको
मुझे तुम्हारी याद बिलकुल नहीं आई
जब तुम्हारी हंसी की आवाज़
वो गली की दूकान पे सुनाई दी
मैंने सोचा नहीं तुम्हारे बारे में कभी
जब भी तुम्हारी पर्फुम लगा के
कोई लड़की गुजरी पास से
सच कहता हूँ
मैंने कभी याद नहीं किया तुम्हें
तुम्हारे जाने के बाद
मुझे कोई ग़म नहीं
मेरा क्या ले गए तुम
हाँ मगर वो झील के किनारे
चने बेचनेवाला पूछ रहा था तुमको
मुझे तुम्हारी याद बिलकुल नहीं आई
जब तुम्हारी हंसी की आवाज़
वो गली की दूकान पे सुनाई दी
मैंने सोचा नहीं तुम्हारे बारे में कभी
जब भी तुम्हारी पर्फुम लगा के
कोई लड़की गुजरी पास से
सच कहता हूँ
मैंने कभी याद नहीं किया तुम्हें
तुम्हारे जाने के बाद
धोखेबाज़
वो एक कविता जो मैंने लिखी थी
याद है?
उसके शब्द पन्नों से कहीं उड़ गए हैं
शायद तुम्हारे पीछे गए हों
ज़रा देखना अपने ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में
कहीं वहाँ तो नहीं छुपे बैठे
वो शब्द जो मैंने छांटे थे रात रात भर जाग के
धोखेबाज़ वो भी तुम्हारे हो गए
याद है?
उसके शब्द पन्नों से कहीं उड़ गए हैं
शायद तुम्हारे पीछे गए हों
ज़रा देखना अपने ड्रेसिंग टेबल की दराज़ में
कहीं वहाँ तो नहीं छुपे बैठे
वो शब्द जो मैंने छांटे थे रात रात भर जाग के
धोखेबाज़ वो भी तुम्हारे हो गए
Subscribe to:
Posts (Atom)