आज भी उसी बस अड्डे पर खड़ा हूँ
जहाँ तुम मुझे छोड़ गई थी
वहां कितनी ही कहानियों को
बनते और बिगड़ते देखा है
मैंने वहीँ चाँद और सितारों को
झगड़ते देखा है
देखा है चाबुक की चोट पर
सपनो को भागते हुए
और रौशनी के इंतज़ार में
रात को रात भर जागते हुए
यादों के लगाम को टूट ते देखा है
और ठीक वहीँ पर वक्त को
हाथ से छुट ते देखा है
याद है उस बस अड्डे की भीड़ में
मुझे खोने से डरती थी तुम
कहीं कोई छीन न ले जाए इसलिए
मेरा हाथ पकड़ कर चलती थी तुम
फिर कैसे भूल गई की वहीँ
एक अरसे से खड़ा हूँ मैं
कभी आकर एक ठोकर ही मार दो
कोने में पत्थर सा पड़ा हूँ मैं .
Monday, July 28, 2008
Saturday, July 19, 2008
वोही बात
एक बात कहनी है तुमसे
वही जो वजह है
हर मुस्कराहट का
और हर एक आंसू का भी
जिसे कहने के लिए
सूरज हर रोज़ धरती से मिलने आता है
और धरती रोज़ जलती है
ये वोही बात है जो
शमा परवाने के कान में कहती है
और वो भी खुश होकर जल जाता है
शायद ये कहते ही जल जाऊं मैं भी
सूरज की तरह ढल जाऊं मैं भी
वैसे तो ये बात पहले भी
कईयों ने कई बार कही है
लेकिन पता नहीं मुझे लगता है
बात बिल्कुल नई है
अब सोचता हूँ कह ही दूँ वो बात
जिसे कहने के लिए मैं रोज़ जीता हूँ
बह न जाए आँखों से
इसलिए अपना ही खून पीता हूँ
मैं जनता हूँ तुम सुनोगी नहीं
मगर नहीं जनता
कोई क्यों इनकार करता है
गलती तुम्हारी भी नहीं
आजकल ऊपर ही इंसान पत्थर का बनता है
वही जो वजह है
हर मुस्कराहट का
और हर एक आंसू का भी
जिसे कहने के लिए
सूरज हर रोज़ धरती से मिलने आता है
और धरती रोज़ जलती है
ये वोही बात है जो
शमा परवाने के कान में कहती है
और वो भी खुश होकर जल जाता है
शायद ये कहते ही जल जाऊं मैं भी
सूरज की तरह ढल जाऊं मैं भी
वैसे तो ये बात पहले भी
कईयों ने कई बार कही है
लेकिन पता नहीं मुझे लगता है
बात बिल्कुल नई है
अब सोचता हूँ कह ही दूँ वो बात
जिसे कहने के लिए मैं रोज़ जीता हूँ
बह न जाए आँखों से
इसलिए अपना ही खून पीता हूँ
मैं जनता हूँ तुम सुनोगी नहीं
मगर नहीं जनता
कोई क्यों इनकार करता है
गलती तुम्हारी भी नहीं
आजकल ऊपर ही इंसान पत्थर का बनता है
hope
वो नहीं आएगा ये भरोसा था
फिर भी इंतज़ार कर रहा था मैं
कुछ हासिल नहीं होना ये भी जनता था
फिर भी जाने क्यों
वो ही गलती बार बार कर रहा था मैं
फिर भी इंतज़ार कर रहा था मैं
कुछ हासिल नहीं होना ये भी जनता था
फिर भी जाने क्यों
वो ही गलती बार बार कर रहा था मैं
मैं और मेरी परछाईं
उस रात मैं अपनी परछाई से बात कर रहा था
वो कुछ कह रही थी मैं बस सुन रहा था
वो कुछ टूटी कड़ियों को जोड़ रही थी
मैं बस देख रहा था
उसने यादो की एक ज़ंजीर मेरे गले में डालनी चाही
मगर वो बीच से टूट गई
शायद कोई कड़ी गुम थी
मैंने उठकर देखा तो आईने से मेरा अक्स गायब था
पलट कर देखा तो मैं नहीं
मेरा अक्स मेरी परछाईं से बातें कर रहा था
परछाईं कुछ कह रही थी और वो सुन रहा था .
वो कुछ कह रही थी मैं बस सुन रहा था
वो कुछ टूटी कड़ियों को जोड़ रही थी
मैं बस देख रहा था
उसने यादो की एक ज़ंजीर मेरे गले में डालनी चाही
मगर वो बीच से टूट गई
शायद कोई कड़ी गुम थी
मैंने उठकर देखा तो आईने से मेरा अक्स गायब था
पलट कर देखा तो मैं नहीं
मेरा अक्स मेरी परछाईं से बातें कर रहा था
परछाईं कुछ कह रही थी और वो सुन रहा था .
Wednesday, July 2, 2008
रोटी और ज़िन्दगी
वो बूढा कचरे की पेटी में
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था
कापते हाथों से वो लम्हा खोज रहा था
जब उसने पहली बार अपने बेटे को उठाया था
आँसू पोछते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब पहली बार उसका बेटा हँसा था
वो बूढा कचरे की पेटी में
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था
ज़ख्मी हाथो से उस पल को खोज रहा था
जब उसने अपने बेटे के घाव पर मरहम लगाया था
लडखडाते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब उसने अपने बेटे को चलना सिखाया था
मगर कचरे की पेटी में सिर्फ़ कचरा ही था
रोटी मिली एक कुत्ते को क्योंकि
वो कुत्ता कचरे की पेटी में
ज़िन्दगी नहीं रोटी तलाश रहा था
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था
कापते हाथों से वो लम्हा खोज रहा था
जब उसने पहली बार अपने बेटे को उठाया था
आँसू पोछते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब पहली बार उसका बेटा हँसा था
वो बूढा कचरे की पेटी में
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था
ज़ख्मी हाथो से उस पल को खोज रहा था
जब उसने अपने बेटे के घाव पर मरहम लगाया था
लडखडाते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब उसने अपने बेटे को चलना सिखाया था
मगर कचरे की पेटी में सिर्फ़ कचरा ही था
रोटी मिली एक कुत्ते को क्योंकि
वो कुत्ता कचरे की पेटी में
ज़िन्दगी नहीं रोटी तलाश रहा था
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