About Me

I am not just what I am.Most of the times I am someone else and rest of the times I pretend to be myself.It is impossible for me to find whether I am someone else or I am pretending to be myself.some people think what they want to think about me and some people think what I want them to think about me.But no one thinks about who really I am.Not even myself.I am a nonconformist and love to be dramatic.......(aisa hi kuchh likhte hain na?) wah!!!kya likha hai...

Monday, July 28, 2008

बस अड्डा

आज भी उसी बस अड्डे पर खड़ा हूँ
जहाँ तुम मुझे छोड़ गई थी
वहां कितनी ही कहानियों को
बनते और बिगड़ते देखा है
मैंने वहीँ चाँद और सितारों को
झगड़ते देखा है
देखा है चाबुक की चोट पर
सपनो को भागते हुए
और रौशनी के इंतज़ार में
रात को रात भर जागते हुए
यादों के लगाम को टूट ते देखा है
और ठीक वहीँ पर वक्त को
हाथ से छुट ते देखा है
याद है उस बस अड्डे की भीड़ में
मुझे खोने से डरती थी तुम
कहीं कोई छीन न ले जाए इसलिए
मेरा हाथ पकड़ कर चलती थी तुम
फिर कैसे भूल गई की वहीँ
एक अरसे से खड़ा हूँ मैं
कभी आकर एक ठोकर ही मार दो
कोने में पत्थर सा पड़ा हूँ मैं .

Saturday, July 19, 2008

वोही बात

एक बात कहनी है तुमसे
वही जो वजह है
हर मुस्कराहट का
और हर एक आंसू का भी
जिसे कहने के लिए
सूरज हर रोज़ धरती से मिलने आता है
और धरती रोज़ जलती है
ये वोही बात है जो
शमा परवाने के कान में कहती है
और वो भी खुश होकर जल जाता है
शायद ये कहते ही जल जाऊं मैं भी
सूरज की तरह ढल जाऊं मैं भी
वैसे तो ये बात पहले भी
कईयों ने कई बार कही है
लेकिन पता नहीं मुझे लगता है
बात बिल्कुल नई है
अब सोचता हूँ कह ही दूँ वो बात
जिसे कहने के लिए मैं रोज़ जीता हूँ
बह न जाए आँखों से
इसलिए अपना ही खून पीता हूँ
मैं जनता हूँ तुम सुनोगी नहीं
मगर नहीं जनता
कोई क्यों इनकार करता है
गलती तुम्हारी भी नहीं
आजकल ऊपर ही इंसान पत्थर का बनता है

hope

वो नहीं आएगा ये भरोसा था
फिर भी इंतज़ार कर रहा था मैं
कुछ हासिल नहीं होना ये भी जनता था
फिर भी जाने क्यों
वो ही गलती बार बार कर रहा था मैं

मैं और मेरी परछाईं

उस रात मैं अपनी परछाई से बात कर रहा था
वो कुछ कह रही थी मैं बस सुन रहा था
वो कुछ टूटी कड़ियों को जोड़ रही थी
मैं बस देख रहा था
उसने यादो की एक ज़ंजीर मेरे गले में डालनी चाही
मगर वो बीच से टूट गई
शायद कोई कड़ी गुम थी
मैंने उठकर देखा तो आईने से मेरा अक्स गायब था
पलट कर देखा तो मैं नहीं
मेरा अक्स मेरी परछाईं से बातें कर रहा था
परछाईं कुछ कह रही थी और वो सुन रहा था .

Wednesday, July 2, 2008

रोटी और ज़िन्दगी

वो बूढा कचरे की पेटी में
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था

कापते हाथों से वो लम्हा खोज रहा था
जब उसने पहली बार अपने बेटे को उठाया था
आँसू पोछते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब पहली बार उसका बेटा हँसा था

वो बूढा कचरे की पेटी में
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था

ज़ख्मी हाथो से उस पल को खोज रहा था
जब उसने अपने बेटे के घाव पर मरहम लगाया था
लडखडाते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब उसने अपने बेटे को चलना सिखाया था

मगर कचरे की पेटी में सिर्फ़ कचरा ही था
रोटी मिली एक कुत्ते को क्योंकि
वो कुत्ता कचरे की पेटी में
ज़िन्दगी नहीं रोटी तलाश रहा था