हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले
डरता है आज आम आदमी काम पे जाने से भी
जाने किस ट्रेन के किस किस डिब्बे में बम निकले
जिस नौजवान खून पर तुम नाज़ करते हो
उन्हें फुर्सत नहीं लड़की और मोबाइल से
उनकी तो बस तमन्ना है की फ़ोन पर ही सालों का दम निकले
अपनी जहालत को छिपाने के लिए सब मुँह बंद रखते हैं
जाने किस घड़ी उनके मुँह से उनके फूटे करम निकले
आज तो दोस्तों के घर भी जाता हूँ तो सम्भल कर
जाने किसके बेडरूम से हमारा सनम निकले
ज़िन्दगी से रु ब रू होने में खतरा है गालिब
जाने जिंदा होना बस हमारा वहम निकले
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले
Friday, April 3, 2009
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