वो दीवार पे टंगे पिछले साल के कैलेंडर ने
सुबह सुबह टोक दिया मुझे
"भाई क्यों लटका रखा है मुझे
जब मेरी जरूरत नहीं?
उतार के फेंक क्यों नहीं देते?"
मैंने कहा "दोस्त कैसे फेंक दूं?
पिछले साल का हर एक दिन
तेरे साथ गुज़ारा है.
दिन में एक बार ही सही
मगर तेरी सूरत जरूर देखता था
जब मैं बेहोश होता था
तो तूने ही मुझे दिन महीने और साल बताये हैं
कैसे निकाल के फेंक दूं तुझे?"
कैलेंडर हँसा और कहा
"दोस्त मुझे लटका के न रख
आज़ाद कर दे मुझे
मैं अपने पन्ने खुद नहीं पलट सकता
मगर तू तो अपने पलट सकता है ना"
मैंने उसकी बात मान के उसे उतारा
और खिड़की से बाहर फेंक दिया
पलट कर देखा तो अब उसकी जगह
उसकी कील पर मैं लटका था
धोखा दिया उसने मुझे
मुझसे झूठ कहा
अपने पन्ने मैं भी नहीं पलट सकता
अब टंगा हूँ उसी दीवार पर
पिउछ्ले साल के कैलेंडर की तरह
की कोई आये और मुझे भी उतार के
फेंक दे
खिड़की से बाहर।।।
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