आईने में एक सूरत देखता हूँ
वोही अपनी ही पुरानी वाली
दिन महीने साल गुज़रते जाते हैं
मग़र ये बदलती भी तो नहीं साली
कई सालों से पुरे दिन
नींद से भरी आंखों को
मसल कर जगाया करता हूँ
और रात को जागते हुए ये ख़याल आता है
की क्यों एक एक दिन करके
अपनी ज़िन्दगी को ज़ाया करता हूँ
पता नहीं क्यों लगता है की
वो आँखें मुझे आज भी
देख रही हैं चश्मे के पीछे से
सच जो भी हो मुझे न बताओ
मुझे तो अच्छा लगता है जब
समुन्दर की रेत खिसकती है
पैरों के नीचे से (incomplete)