अगर हाथ में ये कलम न होती तो
गूंगो की तरह चुप चाप नहीं देखता
मैं भी कुछ बोलता ............... शायद
कागज़ पर शब्दों को रोते देखता हूँ
क्योंकि रोते हुए चेहरों से डरता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
किसी की आंखों में आंसू आने नहीं देता
अपने आँसू से खुशी सींचता ......शायद
दुसरो की भूख में कविता नज़र आती है
दुसरो की तकलीफ में कहानी तलाशता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
कागज़ पर उन का मज़ाक नहीं उडाता
हर भूख को रोटी से मिटाता ..........शायद
चाय बेचते बच्चों को देखते हुए
दो चाय और गटक लेता हूँ
कुछ करने की चाह को जागने से पहले
कागजों के बीच सुला देता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
चाय में मिला उन बच्चों का भविष्य ना पीता
उन्हें अपने हाथों से पढाता .....शायद
किसी को लुट ता देख कर मुँह फेर लेता हूँ
क्रोध जिसे पालने की जरूरत है
कलम से उसका गला घोट देता हूँ
अगर हाथ में ये कलम ना होती तो
इसकी स्याही अपने ही मुँह पर नहीं मलता
हर द्रौपदी की साड़ी और लम्बी करता .....शायद
आज मैंने अपनी नपुंसकता इस कलम पर थोप दी है
और गर्व से इतराते हुए कलम भी तोड़ दी है
अब तो हाथों में वो कलम भी नहीं
कैसे ख़ुद को शब्दों के पीछे छुपाऊँगा
वो जो मुखौटा ख़ुद के लिए तैयार किया था
अब वापस नहीं बना पाऊँगा .....शायद
Tuesday, October 14, 2008
Thursday, October 2, 2008
कहाँ हूँ मैं
आज गले में कुछ खराश है
शायद गई रात नींद में चीखा था मैं
ये रात भी अजीब है
ख़तम ही नहीं होती
रोज़ इसे काट काट कर छोटा करता हूँ
फ़िर उतनी ही लम्बी हो जाती है
कल इसी को काट ते हुए पता नहीं कब सो गया
उसी स्याह रात में अपने अन्दर ही कहीं खो गया
हैरान हूँ मैं की आंखों से
आंसू क्यों नहीं बहता
गला ठीक होता तो सबको ये कहता
की अपने अन्दर अब मैं नहीं रहता
शायद गई रात नींद में चीखा था मैं
ये रात भी अजीब है
ख़तम ही नहीं होती
रोज़ इसे काट काट कर छोटा करता हूँ
फ़िर उतनी ही लम्बी हो जाती है
कल इसी को काट ते हुए पता नहीं कब सो गया
उसी स्याह रात में अपने अन्दर ही कहीं खो गया
हैरान हूँ मैं की आंखों से
आंसू क्यों नहीं बहता
गला ठीक होता तो सबको ये कहता
की अपने अन्दर अब मैं नहीं रहता
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