शायद कोई और भी रहता है
इस मकान में
बार बार आवाज़ लगाता है
चीखता है चिल्लाता है
अजनबी सा
जब मैं सोया होता हूँ
वो भागता है बेतहाशा
पागलों की तरह
मगर उसकी आवाज़
कोई और क्यों नहीं सुनता
एक दिन खोज कर बाहर लाऊंगा उसे
ऐसा सोचा था
मगर उसे खोजते खोजते
खोता जा रहा हूँ मैं
उसी के अन्दर कहीं
अब हम दोनों की आवाज़
एक सी लगती है
उसकी चीखें अब मेरे गले से निकलती हैं
उसके आंसूं अब मेरी आँखों में दिखते हैं
Saturday, January 30, 2010
Monday, January 18, 2010
तूफ़ान और दीवार
उस परिंदे ने उड़ते हुए मुझे आँख मारी थी
मैं समझ नहीं पाया की तूफ़ान आने वाला है
रात भर तेज़ हवाएं चलीं, बारिश हुई
मैं छत पे खड़ा भीगता और सूखता रहा
देखता रहा लोगो को भागते हुए
सन्नाटे में पेड़ों से टकरा कर
लौटती हवा डराती रही मुझे
टपकती बूंदों की आवाज़ शोर करती रही
देखा मैंने परिंदों को
उड़कर आँखों से ओझल होते हुए
मुझे लग रहा था की इस तूफ़ान के बाद
बदल जायेगा सब कुछ
सुबह सूरज के आने के बाद पता लगा
की कुछ खास नहीं बदला था
घरो की छतें तो उड़ गयी थी
मगर दीवार अब भी वहीँ खड़े थे
मैं समझ नहीं पाया की तूफ़ान आने वाला है
रात भर तेज़ हवाएं चलीं, बारिश हुई
मैं छत पे खड़ा भीगता और सूखता रहा
देखता रहा लोगो को भागते हुए
सन्नाटे में पेड़ों से टकरा कर
लौटती हवा डराती रही मुझे
टपकती बूंदों की आवाज़ शोर करती रही
देखा मैंने परिंदों को
उड़कर आँखों से ओझल होते हुए
मुझे लग रहा था की इस तूफ़ान के बाद
बदल जायेगा सब कुछ
सुबह सूरज के आने के बाद पता लगा
की कुछ खास नहीं बदला था
घरो की छतें तो उड़ गयी थी
मगर दीवार अब भी वहीँ खड़े थे
Sunday, January 3, 2010
डरो या डराओ
डरते किस से हो
वो आवाजें जो तुम्हें परेशान करती हैं
वो तो चीखें हैं
डरे हुए बेचारे लोगों की
वो आँखें जो घूरती हैं तुम्हें
अँधेरे में चमकती हैं
उनके आंसुओं से
तुम उनसे डरते हो?
वो घबराये हुए लोग
दौड़ते हैं, तुम्हें हराने को नहीं
वो तो भाग रहे होते हैं
एक दुसरे पे चढ़ कर
खुद को बचाने के लिए
डरो और उस भीड़ का हिस्सा बन जाओ
या दूर करो उनके उस डर को
मगर वो फिर तुम्हें डरायेंगे
बेहतर येही है की
उनको भागने दो इस डर के साथ
तुम बिना टकराए कोई रास्ता बनाओ
और चलते जाओ
वो आवाजें जो तुम्हें परेशान करती हैं
वो तो चीखें हैं
डरे हुए बेचारे लोगों की
वो आँखें जो घूरती हैं तुम्हें
अँधेरे में चमकती हैं
उनके आंसुओं से
तुम उनसे डरते हो?
वो घबराये हुए लोग
दौड़ते हैं, तुम्हें हराने को नहीं
वो तो भाग रहे होते हैं
एक दुसरे पे चढ़ कर
खुद को बचाने के लिए
डरो और उस भीड़ का हिस्सा बन जाओ
या दूर करो उनके उस डर को
मगर वो फिर तुम्हें डरायेंगे
बेहतर येही है की
उनको भागने दो इस डर के साथ
तुम बिना टकराए कोई रास्ता बनाओ
और चलते जाओ
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