About Me

I am not just what I am.Most of the times I am someone else and rest of the times I pretend to be myself.It is impossible for me to find whether I am someone else or I am pretending to be myself.some people think what they want to think about me and some people think what I want them to think about me.But no one thinks about who really I am.Not even myself.I am a nonconformist and love to be dramatic.......(aisa hi kuchh likhte hain na?) wah!!!kya likha hai...

Wednesday, January 25, 2017

लड़की मत जा

ऐ लड़की मत जा रे 
कितना रोयेंगे अब हम 
रोते रहेंगे पता है 
लेकिन अब होता नहीं 

घर साला गन्दा पड़ा है मेरा 
तुम्हारे टूटे बाल बिखरे हैं कमरे में 
उनपर झाड़ू कैसे लगाएं 
नहीं हो पायेगा 
मेरी शर्ट टंगी है अभी भी दीवार से
तुम्हारी खुशबू आती है उससे 
उसे कैसे धो दें हम 

वो टॉवेल अभी भी 
गिला पड़ा है कोने में  
वहीँ पड़ा रहने देंगे उसे भी 

तुमने जो वादे किये थे 
सब वहीँ पड़े हैं बिस्तर पे 
मेरे सिरहाने 

तुम्हारी आवाज़ गूंजती है 
मेरे खाली घर में 
अब कहीं और जाके 
तुम कभी हंसना मत  

बोलना नहीं आता 

कैसे बोलें हम 
रोते रहेंगे पता है 
मगर एक बार 
बस एक बार बात मान ले 
लड़की, मत जा कहीं

Monday, January 23, 2017

उम्र

प्यार भी किया 
और झगड़ा भी 
थोड़ा खुद रोये 
और थोड़ा रुलाये भी 
शादी भी की 
और घर भी बनाया 
छोटा ही था 
ज्यादा बड़ा नहीं 
बीवी ने नौकरी भी की 
और फिर छोड़ भी दिया 
बच्चे भी हुए 
वो भी सुन्दर
हाँ एक लड़की गोद भी ली थी 
सारी  ज़िन्दगी 
साथ रहे थे 

एक रात में 
पूरी उम्र जी ली थी हमने
बाकि कुछ रहा न था 

तो फिर सुबह आईने में 
लाश ही तो दिखनी थी  

Wednesday, January 18, 2017

सिगरेट

हर एक कश के साथ मौत की ओर 
तुम में और सिगरेट में 
कोई ज्यादा फर्क नहीं 
हाँ मगर फर्क तो है
सिगरेट अपनी होती है 
और उसके साथ चेतावनी भी आती है 

मगर मर तो सब रहे हैं 
बचनेवाला कोई नहीं 
कोशिश कर लें जीतनी करनी हो 

मैनें नहीं छोड़ा अभी 
सिगरेट पीना 
अपनी न सही मगर ले तो जाएगी 
मौत की ओर 
बिना चेतावनी के 

बस रोता रहा

ये सर्द हवाएं मुझे जलाती रहीं 
और मैं ओस में खुद को 
भिगोता रहा 
नींद आ जाये इस इंतज़ार में 
मैं चलता और सोता रहा 
मैं तो वो हूँ जो कहीं के नहीं होते 
तो खाली सड़क पर खड़ा 
मैं बस वहीं का होता रहा 

मेरे भाई ने कहा था मुझसे 
की हर पागलपन की दवा होती है 
मगर तुम न रहना गलतफहमी में 
की मुझे जरूरत है तुम्हारी 
मैं हर दवा खाकर भी 
अपने पागलपन को ढोता रहा 

तुम्हें तो अजीब लगता होगा 
मैं जानता हूँ 
मगर ऐसे ही अजीब बना हुआ 
मैं सारी रात जागता 
बस रोता रहा। 

बताओ

सच बताना 
मैनें कभी तुमसे कुछ माँगा था क्या?
उठते बैठते, बातों के दरमियान 
शायद कभी कोई गलती हो गयी हो 
मगर एक बार सोचना 
मैनें कभी तुमसे कुछ माँगा था क्या?

ये रात, ये अँधेरा, ये अकेलापन 
हँसते  हैं मुझपे  
लेकिन मुझे तुम्हारा साथ भी नहीं चाहिए था 

ये उजाले भी कुछ कम नहीं 
साले डराते हैं मुझको 
लेकिन मैंने नहीं कहा कभी 
की मेरा हाथ पकड़ लो 

भागता रहता हूँ 
कभी इसी उजाले और कभी 
इसी अँधेरे के पीछे 
पागल तो हूँ मैं 
थोड़ा नहीं पूरा शायद 
लेकिन सच बताओ 
गलती से भी कभी 
मैंने तुमसे कभी
कुछ भी माँगा था क्या?

Tuesday, January 17, 2017

लाश

लाश का वजन ज्यादा नहीं होता 
हाँ मगर कन्धों पर बोझ ज़्यादा लगता है 
तुम्हें पता ही नहीं होगा 
की लाश कंधे पे उठाये फिरना थका देता है 
"तुम" से ये न समझना 
की मेरा मतलब "तुम" से था
"तुम" से मेरा मतलब 
इस लाश से था 
जो उतरती नहीं मेरे कन्धों से

ये न बोलती है न हँसती  है 
न मुझे रुकने को कहती है 
न ही मुझे चलने को कहती है 
हाँ शिकायत भी नहीं करती अब तो 
चलती रहती है मेरे साथ हमेशा 
बस उतरती नहीं लेकिन 

मेरी ज़िन्दगी आगे जाती है 
या पीछे, मैं समझ ही नहीं पाया कभी 
शायद ये थोड़ी आगे चल के 
वापस पीछे चली जाती है 
हाँ सही तो है 
वापस पीछे ही चली जाती है 

तंग आकर कुछ दिनों पहले 
उतार फेंका था इस लाश को 
अपने कन्धों से 
ये दूर बैठी हंसती थी मुझपे 
और हँसते हुए पहली बार 
इसने मुझसे कुछ कहा 
की तुम मैं हूँ और मैं तुम 
बाकी सब साली बातें हैं 
लोग कहते हैं और भूल जाते हैं
तू कितनी भी रौशनी कर ले 
तेरे हिस्से तो सिर्फ रातें हैं

मैंने भी एक बार वाह! वाह! कहा 
और वापस उठा लिया 
उसे अपने कन्धों पर 
अब ये फिर कुछ नहीं बोलती 
हाँ मगर 
मेरे साथ चलती है 

Sunday, January 8, 2017

अँधेरा

सच क्या है जानते हो?
सच तो ये है की 
सिर्फ अँधेरा ही सच है 
रोशनियाँ तो आती और जाती रहती हैं  
मगर अँधेरा वहीँ रहता है 
ठीक वहीँ, हमेशा।

तुम रौशनी के न होने को 
अँधेरा कहते हो 
सच तो ये है की 
रौशनी में दिखता नहीं 
मगर अँधेरा तो वहीँ होता है
ठीक वहीँ, हमेशा 

तुम्हें अँधेरे में दिखता नहीं 
तो तुम डरते हो अँधेरे से 
अँधेरा हर पल लड़ता है रौशनी से 
हार जाता है हर बार 
मगर भागता नहीं 
वो तो वहीँ होता है 
ठीक वहीँ, हमेशा 

वो......

वो आवारा मनचला आज फिर मिला था मुझको 
अरे वही जो कपडे तो अच्छे पहनता है 
मगर बातें पागलों जैसी करता है 

मिलता है मुझे, कभी कभी यूँ ही 
रात में अकेले सड़कों पर भटकता हुआ 
या कभी किसी चौराहे पर 
अकेले बैठा सिगरेट पिता हुआ 
देख कर लगता है की उसे पता ही नहीं 
की किस रस्ते जाना है 

मैंने करीब से तो नहीं देखा 
मगर आँखें उसकी हिलती नहीं 
एक टक  देखता रहता है 
जैसे अब उसे किसी का इंतज़ार नहीं 
तलाश ख़तम हो गयी हो उसकी अँधेरे में 

पागल लगता तो नहीं 
मगर बातें पागलों जैसी ही करता है 
आज मिला था वहीँ 
काका के पान दूकान के पीछे 
मैंने सिगरेट बढ़ाई  तो बोला 
"गुलाब ख़ूबसूरत तो होता है 
मगर उसकी टहनी छाया नहीं देती 
जानते हो क्यों?
क्योंकि छाया देना उसका काम नहीं
उसका काम तो बस ख़ूबसूरत लगना है."
और निकल गया सिगरेट जला के

मैंने काका से पुछा की कौन है वो 
काका ने भी अजीब जवाब दिया 
"साब कपडे तो अच्छे पहनते हो 
मगर बातें रोज़ पागलों जैसी करते हो."