Wednesday, December 31, 2008
happy new year
सिग्नल पर सुनाई दिया
भीख मांगते कुछ बच्चे
शोर मचा रहे थे
उन फटे कपडों में भागते
गंदे बच्चों को देख कर
लम्बी गाड़ी वाली मैडम ने
खिड़की का कांच ऊपर कर लिया
मैं भी सोच में पड़ गया
की साल बदलने से अचानक
इन अभागो की ज़िन्दगी में
कौन सी ख़ुशी आ गई
इन लावारिसों को क्या फर्क पड़ता है
सन्डे हो मंडे हो या न्यू इयर
हर दिन भीख ही तो मांगना है
इनकी दिवाली दशहरा और न्यू इयर
सब उस दिन होते होंगे
जिस दिन इनका पेट भरता होगा
इन्हें क्यों ख़ुशी हो रही है
सिर्फ़ तारीख ही तो बदल रही है
वैसे मेरे या किसी के ऐतराज़ करने से
उनकी ख़ुशी पर कोई फर्क नहीं पड़ना
और किसी को क्या हक़ है ऐतराज़ करने का
हरी बत्ती जलने पर जब लम्बी गाड़ी
आगे बढ़ी तब मैडम ने
शीशा निचे करके ताज़ा साँस ली
जैसे उन गंदे बच्चों ने
हवा भी गन्दा कर रखा था
जैसे वो गन्दा करते हैं समाज को
मैं जा नहीं पाया
वहीँ खड़ा रहा सड़क के किनारे
घंटो खड़ा रहा मगर
समझ नहीं पाया की ये बच्चे
खुस्श क्यों हैं ......
घर पंहुचा तो घर में भी
सब मना रहे थे जश्न नए साल का
मैं फ़िर नहीं समझ पा रहा था
की सब इतना खुश क्यों हैं
Monday, December 1, 2008
पागल.......
मैं नाराज़ बैठी थी
तुम चाय बनाओगे मेरे लिए
ऐसा कहा था
और फिर चाय जलने की बदबू पर
हसी थी मैं
अभी तक जला बर्तन गन्दा पड़ा है
कल रात तुमसे बातें
करते करते नींद आ गई थी मुझे
फिर तुमने मुझे डांटा था
और नाराज़ होकर कहा था
की कभी बात नहीं करोगे
फिर मैंने फिल्मों की तरह
गाना गाकर मनाया था तुम्हें
तुमने मेरे बाल खीचे थे
अभी तक दर्द हो रहा है
मेरे सोने के बाद तुमने
सिगरेट पी थी रोज़ की तरह
जला हुआ टुकडा अभी भी
छत के कोने में पड़ा है
सुबह सुबह बेसुरा गाना गाकर
तुमने मेरी नींद ख़राब की थी आज
मैंने गुस्से में तुम्हें
जले हुए ब्रेड खिलाये थे
फ़िर तुम आज भी देर से ऑफिस गए
बिना रुमाल लिए रोज़ की तरह
तुम्हारे आने का वक़्त हो रहा है
और ये TV वाले भी न
पागल हो गए हैं शायद
कल से ही हमले में मरनेवालों
में तुम्हारी तस्वीर दिखा रहे हैं
अम्मा भी कल से बेहोश पड़ी है
बाबूजी भी बताते नहीं की
उन्होंने अपने बाल क्यों मुडा लिए
अब तुम ही आकर बताओ इन्हें
की कल आए थे तुम
Wednesday, November 26, 2008
बोझ
मुझे अजीब नज़रों से देखा
एक बार तो मन हुआ की
कह दूँ की
दोस्त मुझे ग़लत न
समझो
मैं भी तुम जैसा ही हूँ
तुम मेरा बोझ ढोते हो
मैं किसी और का
दोनों ही कूली हैं
अगर तुम्हें ये
महसूस होता है की
बोझ तुम्हारे ही कंधो
पर है तो ये गलती
तुम्हारी नहीं
गलती ज़माने की है
जिसने मेरे कन्धों पर
ऐसा बोझ डाला है
वजन मेरे बोझ
का तुम्हारे वाले से
कम नहीं
तुम अपने शरीर पे पड़ा
बोझ तो स्टेशन के बहार
उतार दोगे
मैं अपना बोझ
किस स्टेशन के बाहर उतारूं
मगर मैंने कहा
कुछ नहीं
वो पैसे लेकर
कंधे झटकता हुआ चला गया
मैं खड़ा रहा
दोनों के बोझ के साथ
वहीँ स्टेशन पर
वो बुढ़िया
हमारे घर के
पीछे रहती थी
सब उसे डायन कहते थे
छोटी झोपडी में
वो अकेली रहती थी
कोई उसके पास नहीं जाता
सब डरते थे उससे
मुझे आज भी याद है
दादी ने फटकारा था
माँ ने मारा था मुझको
जब एक दिन
मैंने उसके घर
जाकर रोटी खायी थी
लकड़ी की आंच पर
उसने मेरे लिए
रोटी पकाई थी
रोती हुई अपने बेटे
की कहानी बताई थी
मैं डरा नहीं था
पर आज डरता हूँ
फिर उस झोपडी
में जाने से
वो बुढ़िया तो
अकेले मर गई
पर उसकी रोटी का स्वाद
आज भी याद है मुझको
उसकी सिसकती आवाज़
आज भी याद है मुझको
Tuesday, November 25, 2008
डार्विन का सिद्धांत
को तुम वाणी दोगे
एक दिन वो तुम पर ही
कटाक्ष करेंगे
जिन समाज से परित्यक्त
बेचारों का
तन तुम अपनी
चादर से ढकोगे
वो तुम्हें ही बाज़ार
में नंगा करेंगे
शायद इसी तरह
मानव का विकास होता है
बन्दर से इन्सान
बन्ने की कथा को चरितार्थ
करते ये लोग
शायद येही शुद्ध
और परिपूर्ण मानव हैं
तुम कुछ भी नहीं
इनके सामने
एक आदिम युग के जानवर
मात्र उपहास का एक पात्र
जिसकी उपयोगिता बस
वो लोग ही समझते
और जानते हैं
एक बार सर्दियों में
गाँव गया था
जाड़े की वो रात
अमावस थी शायद
अलाव जलाये बैठे थे हम
घेर कर
ठण्ड से बचने को
उसी रात एक कुत्ते के
रोने की आवाज़ सुनी थी
आज भी गूंजती है
कानो में
चाचा ने उसे
डंडा मारकर भगाया
और वापस आकर
अलाव में और
पुवाल डाला
देर रात तक सब बैठ कर
देश विदेश की बात
करते रहे
कम्बल ओढे
आग पर हाथ सेकते रहे
सुबह उठ कर
मैं चीखा था
वो कुत्ता मरा हुआ
वहीँ बुझे अलाव के
बगल में पड़ा था
उसके रोने की आवाज़
आज भी गूंजती है
कानो में
उसकी आंखों से
टपकते आँसू
जमे नहीं थे सुबह तक .....
दब कर रह गयी
विचारों की सत्यता
प्रश्नों के बुने जाल में
देखने लायक है
उत्तर की विवशता
जीवन के एक एक क्षण को
और लम्बा करता
नसों में बंद
सिगरेट का निकोटीन
उचित मूल्य की दुकानों में
चूल्हा जलाने को तो नहीं
घर जलाने को
मिल जाता है kerosene
ये बस्तियों से उठता धुंआ
ज़रा गौर करो
चूल्हे का नहीं है
ये तो लाशों के जलने की बू है
(incomplete)
Sunday, November 23, 2008
रास्ते पे...
सड़क के बिच
कुत्ते भौकने लगे
मैंने डर कर
रास्ता बदल लिया
वो कुत्ते अभी भी
भौंक रहे हैं
कोई और रास्ता बदल रहा होगा
Tuesday, November 18, 2008
ध्रुव तारा
मेरी तरह तनहा ही रह जाओगे
इस रौशनी का नहीं कोई ठिकाना
पछताओगे जब बादलों से ढक जाओगे
याद आएगी ये ज़मीन
जब आसमान की धूल खाओगे
मेरे जैसे किसी काम के नहीं
जान जाओगे
जब अंधेरे में अकेले बस टिमटिमाओगे
मैं अब ख़ुद नीचे नहीं आ सकता
तुम मुझे क्या नीचे लाओगे
ख़ुद लगायी बाज़ी हर बार
हर बार मैं ही हारा
कभी गौर से देखना कौन है मेरे पास
नहीं दिखेगा कोई साथी न कोई सहारा
आसमान में एक अकेला मैं ध्रुव तारा ............
Tuesday, October 14, 2008
कलम तोड़ दी मैंने ................शायद
गूंगो की तरह चुप चाप नहीं देखता
मैं भी कुछ बोलता ............... शायद
कागज़ पर शब्दों को रोते देखता हूँ
क्योंकि रोते हुए चेहरों से डरता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
किसी की आंखों में आंसू आने नहीं देता
अपने आँसू से खुशी सींचता ......शायद
दुसरो की भूख में कविता नज़र आती है
दुसरो की तकलीफ में कहानी तलाशता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
कागज़ पर उन का मज़ाक नहीं उडाता
हर भूख को रोटी से मिटाता ..........शायद
चाय बेचते बच्चों को देखते हुए
दो चाय और गटक लेता हूँ
कुछ करने की चाह को जागने से पहले
कागजों के बीच सुला देता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
चाय में मिला उन बच्चों का भविष्य ना पीता
उन्हें अपने हाथों से पढाता .....शायद
किसी को लुट ता देख कर मुँह फेर लेता हूँ
क्रोध जिसे पालने की जरूरत है
कलम से उसका गला घोट देता हूँ
अगर हाथ में ये कलम ना होती तो
इसकी स्याही अपने ही मुँह पर नहीं मलता
हर द्रौपदी की साड़ी और लम्बी करता .....शायद
आज मैंने अपनी नपुंसकता इस कलम पर थोप दी है
और गर्व से इतराते हुए कलम भी तोड़ दी है
अब तो हाथों में वो कलम भी नहीं
कैसे ख़ुद को शब्दों के पीछे छुपाऊँगा
वो जो मुखौटा ख़ुद के लिए तैयार किया था
अब वापस नहीं बना पाऊँगा .....शायद
Thursday, October 2, 2008
कहाँ हूँ मैं
शायद गई रात नींद में चीखा था मैं
ये रात भी अजीब है
ख़तम ही नहीं होती
रोज़ इसे काट काट कर छोटा करता हूँ
फ़िर उतनी ही लम्बी हो जाती है
कल इसी को काट ते हुए पता नहीं कब सो गया
उसी स्याह रात में अपने अन्दर ही कहीं खो गया
हैरान हूँ मैं की आंखों से
आंसू क्यों नहीं बहता
गला ठीक होता तो सबको ये कहता
की अपने अन्दर अब मैं नहीं रहता
Sunday, September 21, 2008
फ़िर कब आओगे
जाऊँगा कहाँ
उसने कहा
जब भी आँखें खोलोगे
मुझे ही पाओगे
आँख खुली तो अँधेरा था
मैंने फ़िर पूछा
सब तो गए
अब क्या तुम भी छोड़ जाओगे
सूरज ने कहा
इस चाँद में भी मेरी ही रौशनी है
मुझसे बचकर कहाँ जाओगे
फ़िर मैंने तस्वीर से पूछा
जागते हुए दर्द देते हो
अब क्या सपनो में भी सताओगे
तस्वीर ने कहा
ख़ुद छोड़ गए अब रोते हो
मुझको तनहा करके
तुम भी बस तन्हाई ही पाओगे
Sunday, August 31, 2008
कल फिर ......
कुछ फटे पुराने अख़बार
कुछ पुरानी खाली बोतलें
और इसी भूल भुलैया में
मुझे खोजती मेरी ज़िन्दगी
कल शाम मिली थी मुझको
उसी तंग गली के नुक्कड़ पे
जहाँ मैंने उसका गला घोटा था
जब ज़िन्दगी और मैं साथ रहते थे
मुझे वो वक्त याद दिला रही थी
मेरी यादों पे जमी राख हटा रही थी
कल फ़िर मैंने बेरुखी से मुँह फेर लिया
सिगरेट के धुंए में ख़ुद को घेर लिया
कल फिर एक जाम बनाया
और ज़िन्दगी को उसी में डुबाया
कल फिर उसे तड़पता देख कर
खुशी से रोया हूँ मैं
कल फिर अपना ही खून कर के
चैन से सोया हूँ मैं
Monday, July 28, 2008
बस अड्डा
जहाँ तुम मुझे छोड़ गई थी
वहां कितनी ही कहानियों को
बनते और बिगड़ते देखा है
मैंने वहीँ चाँद और सितारों को
झगड़ते देखा है
देखा है चाबुक की चोट पर
सपनो को भागते हुए
और रौशनी के इंतज़ार में
रात को रात भर जागते हुए
यादों के लगाम को टूट ते देखा है
और ठीक वहीँ पर वक्त को
हाथ से छुट ते देखा है
याद है उस बस अड्डे की भीड़ में
मुझे खोने से डरती थी तुम
कहीं कोई छीन न ले जाए इसलिए
मेरा हाथ पकड़ कर चलती थी तुम
फिर कैसे भूल गई की वहीँ
एक अरसे से खड़ा हूँ मैं
कभी आकर एक ठोकर ही मार दो
कोने में पत्थर सा पड़ा हूँ मैं .
Saturday, July 19, 2008
वोही बात
वही जो वजह है
हर मुस्कराहट का
और हर एक आंसू का भी
जिसे कहने के लिए
सूरज हर रोज़ धरती से मिलने आता है
और धरती रोज़ जलती है
ये वोही बात है जो
शमा परवाने के कान में कहती है
और वो भी खुश होकर जल जाता है
शायद ये कहते ही जल जाऊं मैं भी
सूरज की तरह ढल जाऊं मैं भी
वैसे तो ये बात पहले भी
कईयों ने कई बार कही है
लेकिन पता नहीं मुझे लगता है
बात बिल्कुल नई है
अब सोचता हूँ कह ही दूँ वो बात
जिसे कहने के लिए मैं रोज़ जीता हूँ
बह न जाए आँखों से
इसलिए अपना ही खून पीता हूँ
मैं जनता हूँ तुम सुनोगी नहीं
मगर नहीं जनता
कोई क्यों इनकार करता है
गलती तुम्हारी भी नहीं
आजकल ऊपर ही इंसान पत्थर का बनता है
hope
फिर भी इंतज़ार कर रहा था मैं
कुछ हासिल नहीं होना ये भी जनता था
फिर भी जाने क्यों
वो ही गलती बार बार कर रहा था मैं
मैं और मेरी परछाईं
वो कुछ कह रही थी मैं बस सुन रहा था
वो कुछ टूटी कड़ियों को जोड़ रही थी
मैं बस देख रहा था
उसने यादो की एक ज़ंजीर मेरे गले में डालनी चाही
मगर वो बीच से टूट गई
शायद कोई कड़ी गुम थी
मैंने उठकर देखा तो आईने से मेरा अक्स गायब था
पलट कर देखा तो मैं नहीं
मेरा अक्स मेरी परछाईं से बातें कर रहा था
परछाईं कुछ कह रही थी और वो सुन रहा था .
Wednesday, July 2, 2008
रोटी और ज़िन्दगी
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था
कापते हाथों से वो लम्हा खोज रहा था
जब उसने पहली बार अपने बेटे को उठाया था
आँसू पोछते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब पहली बार उसका बेटा हँसा था
वो बूढा कचरे की पेटी में
रोटी नहीं ज़िन्दगी तलाश रहा था
ज़ख्मी हाथो से उस पल को खोज रहा था
जब उसने अपने बेटे के घाव पर मरहम लगाया था
लडखडाते हुए उस पल को याद कर रहा था
जब उसने अपने बेटे को चलना सिखाया था
मगर कचरे की पेटी में सिर्फ़ कचरा ही था
रोटी मिली एक कुत्ते को क्योंकि
वो कुत्ता कचरे की पेटी में
ज़िन्दगी नहीं रोटी तलाश रहा था
Friday, June 27, 2008
I could not make them bigger.....
रोज़ देखता हूँ की कहीं वो एक से दो तो नहीं हो गया
इसी फिराक़ में बाज़ार से कई और नई किताबें खरीद लाया हूँ मैं .
2.वोह जो फटी हुई चादर मैंने बरसो से संभल कर राखी थी
शायद कहीं खो गई
माँ ने पैबंद लगा दिए हैं उसपर .
Tuesday, June 10, 2008
please help!!!!!
वो जो था हमारे बीच उसे मैं क्या नाम दूँ ?
दुश्मनी कहूं तो नाइंसाफी होगी ,
कहूं उसे दोस्ती तो बदगुमानी होगी ,
तुम कह दो तो मैं तुम्हे अपनी हर सुबह हर शाम दूँ ,
मगर बताओ वो जो था हमारे बीच उसे मैं क्या नाम दूँ ।
मैं कह गया सब कुछ मगर तुमने जैसे सुना ही नहीं ,
इंकार ही कर देते मगर तुमने कुछ कहा ही नहीं ,
अब तुम्हे याद करने के सिवा इस दिल को और क्या काम दूँ ,
hangover
आँख खुली तो सूरज सर पे आ गया था ,
रात के सपने अभी भी आंखों पे तैर रहे थे ,
सबकुछ वोही था और रोज़ की तरह वो भी नहीं था ,
रोशनदान से आती धुप परछाईं सी बना रही थी ,
परछाईं से कुछ धड़कन की सी आवाज़ें आ रही थी ,
लगता था जैसे ज़िन्दगी सितार बजा रही हो ,
शाम हुई ,धुप गई ,परछाईं भी गई ,
लगा सितार के तार टूट गए .
Wednesday, May 28, 2008
Good morning!!!!!!!!
फ़िर ये सोच कर चुप रह गया की उन्ही सातों में से ही तो एक होगा ,
यूँ एक एक कर के गुज़र गया ज़माना सा लगता है ,
बहार निकल कर देखता हूँ तो ,
ये ज़मीन और वो आस्मां भी पुराना सा लगता है .
Am I a good salesman?
कुछ सीधे सादे नादाँ थे , तो कुछ शातिर सौदागर ,
भीड़ दिखती थी सबसे ज़्यादा अपनी ही दुकान पर ,
मगर हिसाब ये कहता था की मैं सौदे करता हूँ सारे नुकसान पर ,
खुश था मैं फ़िर भी हिसाब में नुकसान ही दिखता था ,
अपने खर्चे पे इतनी रौशनी की थी की हर रास्ता आसान ही दिखता था ,
नादाँ समझते थे की मुझसा कोई शातिर नहीं ,
और शातिरों को ग़म था की उनका पला पड़ा है एक बेईमान से ,
कोई मेरे घर आता तो देखता की मैं जलाता हूँ अपना ही सामान ,
जो कभी लाया था बड़े अरमान से ,
उसी भीड़ में कुछ ऐसे समझदार भी थे जो दोस्त थे अपने ,
मगर वो भी क्या करते जब मैं देखता ही हूँ ग़लत सपने ,
मैं सही था या वो लोग ग़लत ,ये भी एक गुत्थी रही ,
और मुझको ही ग़लत साबित करती मेरी अपनी ही चुप्पी रही ,
अब तो वक्त आ गया अपनी दुकान कहीं और लगाने का ,
कुछ और नए लोगों के लिए कुछ और नया सामान लेन का ,
कोशिश करूंगा की अब नुकसान न हो ज़्यादा ,
या कोई हिस्सेदार मिल जाए जो बाँट ले नुकसान आधा -आधा ,
सौदा अगर एक से न पटे तो किसी और को आवाज़ लगाऊँगा ,
मगर मैंने भी कसम खायी है की अपनी दुकान ज़रूर चलाऊँगा .
Cause of inflation
मगर मैं जानता हूँ इसका मतलब ,
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा ,
मैंने देखि है वो एक दाम की दूकान ,
जहाँ शरीर और भावनाएं एक ही खिड़की पे बिकती हैं ,
मगर वहां जाने के लिए ,
मुझे ख़ुद को सूली पे चढाना होगा ,
मैं जनता हूँ उस बाज़ार का रास्ता ,
जेहन सुदा होता है लाशों का ,
मगर वहां मुनाफे के लिए ,
मुझे ख़ुद को ख़ुद से लड़ाना होगा ,
कभी सोचता हूँ क्यों मरती है माँ
अपने भूख से रोते बच्चे को ,
मगर ये समझने के लिए
मुझे समझ कहीं और से लाना होगा ,
इसीलिए खड़ा हूँ समझ के बाज़ार में ,
मगर वो कहते हैं
पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मैं जानता हूँ इसका मतलब
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा
My daily routine
अपनी परछाईं का ,
शाम ढलते ही परछाईं भी डूब गई ,
गुज़र गई शाम रात के इंतज़ार में
रोज़ की तरह वो शाम भी हमारी खूब गई ।
रात होते ही महसूस हुआ की अँधेरा है ,
दिखता नहीं कुछ भी
इससे अच्छा तो अपना वोही पुराना सवेरा है ,
हार कर निकला मैं रौशनी की तलाश में ,
रौशनी मिली भी तो ऊपर आकाश में ,
जी तो चाह की एक तारा तोड़ लाऊं ,
मगर फ़िर ख्याल आया की ले तो आऊँ
पर अंधेरे में रास्ता किसे दिखाऊँ .
ढूँढा मगर कोई न मिला जिसे जरूरत हो अपनी ,
इस शहर में सबके पास हैं रोशनियाँ अपनी अपनी .
वापस आया उसी कमरे में अपने
गुज़र गई रात भी बस जागती आंखों से देखते सपने .
बड़ी अजीब बात है ....
सबने कोयल की कूक सुनी है ,
क्या कभी किसी ने कोयल को रोते सुना है ?
तो क्या कोयल कभी रोती नहीं ?
या रोती है बिना आवाज़ किए ,अकेले में ?
मुर्गा हर रोज़ सुबह सबको जगाता ही क्यों है ?
क्या मुर्गे को किसी ने लोरी गाते सुना है कभी ?
तो क्या मुर्गा अपने बच्चों से प्यार नहीं करता ?
या फिर करता है मगर जता नहीं पाता ?
क्या सुर में गाने वाला कौवा और नादाँ लोमडी होते ही नहीं ?
या होते हैं मगर किसी और दुनिया में ?
येही सोचते सोचते रोज सुबह हो जाती है ,
सूरज को देख कर सोचता हूँ ये एक ही रस्ते पे क्यों चलता है .
क्या दूसरा कोई रास्ता इसे पाता नहीं ?
या पाता है मगर ...........
बड़ी अजीब बात है .