About Me

I am not just what I am.Most of the times I am someone else and rest of the times I pretend to be myself.It is impossible for me to find whether I am someone else or I am pretending to be myself.some people think what they want to think about me and some people think what I want them to think about me.But no one thinks about who really I am.Not even myself.I am a nonconformist and love to be dramatic.......(aisa hi kuchh likhte hain na?) wah!!!kya likha hai...

Wednesday, May 28, 2008

Good morning!!!!!!!!

सुबह हुई तो सोचा पड़ोसी से पूछूं दिन कौन सा है ,
फ़िर ये सोच कर चुप रह गया की उन्ही सातों में से ही तो एक होगा ,
यूँ एक एक कर के गुज़र गया ज़माना सा लगता है ,
बहार निकल कर देखता हूँ तो ,
ये ज़मीन और वो आस्मां भी पुराना सा लगता है .

Am I a good salesman?

फ़िर घुमते हुए कुछ और नए लोग मिले ,
कुछ सीधे सादे नादाँ थे , तो कुछ शातिर सौदागर ,
भीड़ दिखती थी सबसे ज़्यादा अपनी ही दुकान पर ,
मगर हिसाब ये कहता था की मैं सौदे करता हूँ सारे नुकसान पर ,
खुश था मैं फ़िर भी हिसाब में नुकसान ही दिखता था ,
अपने खर्चे पे इतनी रौशनी की थी की हर रास्ता आसान ही दिखता था ,
नादाँ समझते थे की मुझसा कोई शातिर नहीं ,
और शातिरों को ग़म था की उनका पला पड़ा है एक बेईमान से ,
कोई मेरे घर आता तो देखता की मैं जलाता हूँ अपना ही सामान ,
जो कभी लाया था बड़े अरमान से ,
उसी भीड़ में कुछ ऐसे समझदार भी थे जो दोस्त थे अपने ,
मगर वो भी क्या करते जब मैं देखता ही हूँ ग़लत सपने ,
मैं सही था या वो लोग ग़लत ,ये भी एक गुत्थी रही ,
और मुझको ही ग़लत साबित करती मेरी अपनी ही चुप्पी रही ,
अब तो वक्त आ गया अपनी दुकान कहीं और लगाने का ,
कुछ और नए लोगों के लिए कुछ और नया सामान लेन का ,
कोशिश करूंगा की अब नुकसान न हो ज़्यादा ,
या कोई हिस्सेदार मिल जाए जो बाँट ले नुकसान आधा -आधा ,
सौदा अगर एक से न पटे तो किसी और को आवाज़ लगाऊँगा ,
मगर मैंने भी कसम खायी है की अपनी दुकान ज़रूर चलाऊँगा .

Cause of inflation

पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मगर मैं जानता हूँ इसका मतलब ,
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा ,
मैंने देखि है वो एक दाम की दूकान ,
जहाँ शरीर और भावनाएं एक ही खिड़की पे बिकती हैं ,
मगर वहां जाने के लिए ,
मुझे ख़ुद को सूली पे चढाना होगा ,
मैं जनता हूँ उस बाज़ार का रास्ता ,
जेहन सुदा होता है लाशों का ,
मगर वहां मुनाफे के लिए ,
मुझे ख़ुद को ख़ुद से लड़ाना होगा ,
कभी सोचता हूँ क्यों मरती है माँ
अपने भूख से रोते बच्चे को ,
मगर ये समझने के लिए
मुझे समझ कहीं और से लाना होगा ,
इसीलिए खड़ा हूँ समझ के बाज़ार में ,
मगर वो कहते हैं
पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मैं जानता हूँ इसका मतलब
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा

My daily routine

दिन गुजरा पीछा करते हुए
अपनी परछाईं का ,
शाम ढलते ही परछाईं भी डूब गई ,
गुज़र गई शाम रात के इंतज़ार में
रोज़ की तरह वो शाम भी हमारी खूब गई ।

रात होते ही महसूस हुआ की अँधेरा है ,
दिखता नहीं कुछ भी
इससे अच्छा तो अपना वोही पुराना सवेरा है ,
हार कर निकला मैं रौशनी की तलाश में ,
रौशनी मिली भी तो ऊपर आकाश में ,
जी तो चाह की एक तारा तोड़ लाऊं ,
मगर फ़िर ख्याल आया की ले तो आऊँ
पर अंधेरे में रास्ता किसे दिखाऊँ .
ढूँढा मगर कोई न मिला जिसे जरूरत हो अपनी ,
इस शहर में सबके पास हैं रोशनियाँ अपनी अपनी .
वापस आया उसी कमरे में अपने
गुज़र गई रात भी बस जागती आंखों से देखते सपने .

बड़ी अजीब बात है ....

बड़ी अजीब बात है ,
सबने कोयल की कूक सुनी है ,
क्या कभी किसी ने कोयल को रोते सुना है ?
तो क्या कोयल कभी रोती नहीं ?
या रोती है बिना आवाज़ किए ,अकेले में ?
मुर्गा हर रोज़ सुबह सबको जगाता ही क्यों है ?
क्या मुर्गे को किसी ने लोरी गाते सुना है कभी ?
तो क्या मुर्गा अपने बच्चों से प्यार नहीं करता ?
या फिर करता है मगर जता नहीं पाता ?
क्या सुर में गाने वाला कौवा और नादाँ लोमडी होते ही नहीं ?
या होते हैं मगर किसी और दुनिया में ?
येही सोचते सोचते रोज सुबह हो जाती है ,
सूरज को देख कर सोचता हूँ ये एक ही रस्ते पे क्यों चलता है .
क्या दूसरा कोई रास्ता इसे पाता नहीं ?
या पाता है मगर ...........
बड़ी अजीब बात है .