सुबह हुई तो सोचा पड़ोसी से पूछूं दिन कौन सा है ,
फ़िर ये सोच कर चुप रह गया की उन्ही सातों में से ही तो एक होगा ,
यूँ एक एक कर के गुज़र गया ज़माना सा लगता है ,
बहार निकल कर देखता हूँ तो ,
ये ज़मीन और वो आस्मां भी पुराना सा लगता है .
Wednesday, May 28, 2008
Am I a good salesman?
फ़िर घुमते हुए कुछ और नए लोग मिले ,
कुछ सीधे सादे नादाँ थे , तो कुछ शातिर सौदागर ,
भीड़ दिखती थी सबसे ज़्यादा अपनी ही दुकान पर ,
मगर हिसाब ये कहता था की मैं सौदे करता हूँ सारे नुकसान पर ,
खुश था मैं फ़िर भी हिसाब में नुकसान ही दिखता था ,
अपने खर्चे पे इतनी रौशनी की थी की हर रास्ता आसान ही दिखता था ,
नादाँ समझते थे की मुझसा कोई शातिर नहीं ,
और शातिरों को ग़म था की उनका पला पड़ा है एक बेईमान से ,
कोई मेरे घर आता तो देखता की मैं जलाता हूँ अपना ही सामान ,
जो कभी लाया था बड़े अरमान से ,
उसी भीड़ में कुछ ऐसे समझदार भी थे जो दोस्त थे अपने ,
मगर वो भी क्या करते जब मैं देखता ही हूँ ग़लत सपने ,
मैं सही था या वो लोग ग़लत ,ये भी एक गुत्थी रही ,
और मुझको ही ग़लत साबित करती मेरी अपनी ही चुप्पी रही ,
अब तो वक्त आ गया अपनी दुकान कहीं और लगाने का ,
कुछ और नए लोगों के लिए कुछ और नया सामान लेन का ,
कोशिश करूंगा की अब नुकसान न हो ज़्यादा ,
या कोई हिस्सेदार मिल जाए जो बाँट ले नुकसान आधा -आधा ,
सौदा अगर एक से न पटे तो किसी और को आवाज़ लगाऊँगा ,
मगर मैंने भी कसम खायी है की अपनी दुकान ज़रूर चलाऊँगा .
कुछ सीधे सादे नादाँ थे , तो कुछ शातिर सौदागर ,
भीड़ दिखती थी सबसे ज़्यादा अपनी ही दुकान पर ,
मगर हिसाब ये कहता था की मैं सौदे करता हूँ सारे नुकसान पर ,
खुश था मैं फ़िर भी हिसाब में नुकसान ही दिखता था ,
अपने खर्चे पे इतनी रौशनी की थी की हर रास्ता आसान ही दिखता था ,
नादाँ समझते थे की मुझसा कोई शातिर नहीं ,
और शातिरों को ग़म था की उनका पला पड़ा है एक बेईमान से ,
कोई मेरे घर आता तो देखता की मैं जलाता हूँ अपना ही सामान ,
जो कभी लाया था बड़े अरमान से ,
उसी भीड़ में कुछ ऐसे समझदार भी थे जो दोस्त थे अपने ,
मगर वो भी क्या करते जब मैं देखता ही हूँ ग़लत सपने ,
मैं सही था या वो लोग ग़लत ,ये भी एक गुत्थी रही ,
और मुझको ही ग़लत साबित करती मेरी अपनी ही चुप्पी रही ,
अब तो वक्त आ गया अपनी दुकान कहीं और लगाने का ,
कुछ और नए लोगों के लिए कुछ और नया सामान लेन का ,
कोशिश करूंगा की अब नुकसान न हो ज़्यादा ,
या कोई हिस्सेदार मिल जाए जो बाँट ले नुकसान आधा -आधा ,
सौदा अगर एक से न पटे तो किसी और को आवाज़ लगाऊँगा ,
मगर मैंने भी कसम खायी है की अपनी दुकान ज़रूर चलाऊँगा .
Cause of inflation
पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मगर मैं जानता हूँ इसका मतलब ,
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा ,
मैंने देखि है वो एक दाम की दूकान ,
जहाँ शरीर और भावनाएं एक ही खिड़की पे बिकती हैं ,
मगर वहां जाने के लिए ,
मुझे ख़ुद को सूली पे चढाना होगा ,
मैं जनता हूँ उस बाज़ार का रास्ता ,
जेहन सुदा होता है लाशों का ,
मगर वहां मुनाफे के लिए ,
मुझे ख़ुद को ख़ुद से लड़ाना होगा ,
कभी सोचता हूँ क्यों मरती है माँ
अपने भूख से रोते बच्चे को ,
मगर ये समझने के लिए
मुझे समझ कहीं और से लाना होगा ,
इसीलिए खड़ा हूँ समझ के बाज़ार में ,
मगर वो कहते हैं
पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मैं जानता हूँ इसका मतलब
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा
मगर मैं जानता हूँ इसका मतलब ,
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा ,
मैंने देखि है वो एक दाम की दूकान ,
जहाँ शरीर और भावनाएं एक ही खिड़की पे बिकती हैं ,
मगर वहां जाने के लिए ,
मुझे ख़ुद को सूली पे चढाना होगा ,
मैं जनता हूँ उस बाज़ार का रास्ता ,
जेहन सुदा होता है लाशों का ,
मगर वहां मुनाफे के लिए ,
मुझे ख़ुद को ख़ुद से लड़ाना होगा ,
कभी सोचता हूँ क्यों मरती है माँ
अपने भूख से रोते बच्चे को ,
मगर ये समझने के लिए
मुझे समझ कहीं और से लाना होगा ,
इसीलिए खड़ा हूँ समझ के बाज़ार में ,
मगर वो कहते हैं
पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मैं जानता हूँ इसका मतलब
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा
My daily routine
दिन गुजरा पीछा करते हुए
अपनी परछाईं का ,
शाम ढलते ही परछाईं भी डूब गई ,
गुज़र गई शाम रात के इंतज़ार में
रोज़ की तरह वो शाम भी हमारी खूब गई ।
रात होते ही महसूस हुआ की अँधेरा है ,
दिखता नहीं कुछ भी
इससे अच्छा तो अपना वोही पुराना सवेरा है ,
हार कर निकला मैं रौशनी की तलाश में ,
रौशनी मिली भी तो ऊपर आकाश में ,
जी तो चाह की एक तारा तोड़ लाऊं ,
मगर फ़िर ख्याल आया की ले तो आऊँ
पर अंधेरे में रास्ता किसे दिखाऊँ .
ढूँढा मगर कोई न मिला जिसे जरूरत हो अपनी ,
इस शहर में सबके पास हैं रोशनियाँ अपनी अपनी .
वापस आया उसी कमरे में अपने
गुज़र गई रात भी बस जागती आंखों से देखते सपने .
अपनी परछाईं का ,
शाम ढलते ही परछाईं भी डूब गई ,
गुज़र गई शाम रात के इंतज़ार में
रोज़ की तरह वो शाम भी हमारी खूब गई ।
रात होते ही महसूस हुआ की अँधेरा है ,
दिखता नहीं कुछ भी
इससे अच्छा तो अपना वोही पुराना सवेरा है ,
हार कर निकला मैं रौशनी की तलाश में ,
रौशनी मिली भी तो ऊपर आकाश में ,
जी तो चाह की एक तारा तोड़ लाऊं ,
मगर फ़िर ख्याल आया की ले तो आऊँ
पर अंधेरे में रास्ता किसे दिखाऊँ .
ढूँढा मगर कोई न मिला जिसे जरूरत हो अपनी ,
इस शहर में सबके पास हैं रोशनियाँ अपनी अपनी .
वापस आया उसी कमरे में अपने
गुज़र गई रात भी बस जागती आंखों से देखते सपने .
बड़ी अजीब बात है ....
बड़ी अजीब बात है ,
सबने कोयल की कूक सुनी है ,
क्या कभी किसी ने कोयल को रोते सुना है ?
तो क्या कोयल कभी रोती नहीं ?
या रोती है बिना आवाज़ किए ,अकेले में ?
मुर्गा हर रोज़ सुबह सबको जगाता ही क्यों है ?
क्या मुर्गे को किसी ने लोरी गाते सुना है कभी ?
तो क्या मुर्गा अपने बच्चों से प्यार नहीं करता ?
या फिर करता है मगर जता नहीं पाता ?
क्या सुर में गाने वाला कौवा और नादाँ लोमडी होते ही नहीं ?
या होते हैं मगर किसी और दुनिया में ?
येही सोचते सोचते रोज सुबह हो जाती है ,
सूरज को देख कर सोचता हूँ ये एक ही रस्ते पे क्यों चलता है .
क्या दूसरा कोई रास्ता इसे पाता नहीं ?
या पाता है मगर ...........
बड़ी अजीब बात है .
सबने कोयल की कूक सुनी है ,
क्या कभी किसी ने कोयल को रोते सुना है ?
तो क्या कोयल कभी रोती नहीं ?
या रोती है बिना आवाज़ किए ,अकेले में ?
मुर्गा हर रोज़ सुबह सबको जगाता ही क्यों है ?
क्या मुर्गे को किसी ने लोरी गाते सुना है कभी ?
तो क्या मुर्गा अपने बच्चों से प्यार नहीं करता ?
या फिर करता है मगर जता नहीं पाता ?
क्या सुर में गाने वाला कौवा और नादाँ लोमडी होते ही नहीं ?
या होते हैं मगर किसी और दुनिया में ?
येही सोचते सोचते रोज सुबह हो जाती है ,
सूरज को देख कर सोचता हूँ ये एक ही रस्ते पे क्यों चलता है .
क्या दूसरा कोई रास्ता इसे पाता नहीं ?
या पाता है मगर ...........
बड़ी अजीब बात है .
Subscribe to:
Posts (Atom)