About Me

I am not just what I am.Most of the times I am someone else and rest of the times I pretend to be myself.It is impossible for me to find whether I am someone else or I am pretending to be myself.some people think what they want to think about me and some people think what I want them to think about me.But no one thinks about who really I am.Not even myself.I am a nonconformist and love to be dramatic.......(aisa hi kuchh likhte hain na?) wah!!!kya likha hai...

Wednesday, November 26, 2008

बोझ

उस नौजवान कूली ने
मुझे अजीब नज़रों से देखा
एक बार तो मन हुआ की
कह दूँ की
दोस्त मुझे ग़लत न
समझो
मैं भी तुम जैसा ही हूँ
तुम मेरा बोझ ढोते हो
मैं किसी और का
दोनों ही कूली हैं
अगर तुम्हें ये
महसूस होता है की
बोझ तुम्हारे ही कंधो
पर है तो ये गलती
तुम्हारी नहीं
गलती ज़माने की है
जिसने मेरे कन्धों पर
ऐसा बोझ डाला है
जो दिखता नहीं
वजन मेरे बोझ
का तुम्हारे वाले से
कम नहीं
यकीं करो
तुम अपने शरीर पे पड़ा
बोझ तो स्टेशन के बहार
उतार दोगे
मैं अपना बोझ
किस स्टेशन के बाहर उतारूं
मगर मैंने कहा
कुछ नहीं
वो पैसे लेकर
कंधे झटकता हुआ चला गया
मैं खड़ा रहा
दोनों के बोझ के साथ
वहीँ स्टेशन पर

वो बुढ़िया

वो बुढ़िया जो
हमारे घर के
पीछे रहती थी
सब उसे डायन कहते थे
छोटी झोपडी में
वो अकेली रहती थी
कोई उसके पास नहीं जाता
सब डरते थे उससे
मुझे आज भी याद है
दादी ने फटकारा था
माँ ने मारा था मुझको
जब एक दिन
मैंने उसके घर
जाकर रोटी खायी थी
लकड़ी की आंच पर
उसने मेरे लिए
रोटी पकाई थी
रोती हुई अपने बेटे
की कहानी बताई थी
मैं डरा नहीं था
पर आज डरता हूँ
फिर उस झोपडी
में जाने से
वो बुढ़िया तो
अकेले मर गई
पर उसकी रोटी का स्वाद
आज भी याद है मुझको
उसकी सिसकती आवाज़
आज भी याद है मुझको

Tuesday, November 25, 2008

डार्विन का सिद्धांत

जिन अबोध बालकों
को तुम वाणी दोगे
एक दिन वो तुम पर ही
कटाक्ष करेंगे
जिन समाज से परित्यक्त
बेचारों का
तन तुम अपनी
चादर से ढकोगे
वो तुम्हें ही बाज़ार
में नंगा करेंगे
शायद इसी तरह
मानव का विकास होता है
बन्दर से इन्सान
बन्ने की कथा को चरितार्थ
करते ये लोग
शायद येही शुद्ध
और परिपूर्ण मानव हैं
तुम कुछ भी नहीं
इनके सामने
एक आदिम युग के जानवर
मात्र उपहास का एक पात्र
जिसकी उपयोगिता बस
वो लोग ही समझते
और जानते हैं
बचपन में
एक बार सर्दियों में
गाँव गया था
जाड़े की वो रात
अमावस थी शायद
अलाव जलाये बैठे थे हम
घेर कर
ठण्ड से बचने को
उसी रात एक कुत्ते के
रोने की आवाज़ सुनी थी
आज भी गूंजती है
कानो में
चाचा ने उसे
डंडा मारकर भगाया
और वापस आकर
अलाव में और
पुवाल डाला
देर रात तक सब बैठ कर
देश विदेश की बात
करते रहे
कम्बल ओढे
आग पर हाथ सेकते रहे
सुबह उठ कर
मैं चीखा था
वो कुत्ता मरा हुआ
वहीँ बुझे अलाव के
बगल में पड़ा था
उसके रोने की आवाज़
आज भी गूंजती है
कानो में
उसकी आंखों से
टपकते आँसू
जमे नहीं थे सुबह तक .....
ठहाकों ठहाकों की प्रतिध्वनि में
दब कर रह गयी
विचारों की सत्यता
प्रश्नों के बुने जाल में
देखने लायक है
उत्तर की विवशता
जीवन के एक एक क्षण को
और लम्बा करता
नसों में बंद
सिगरेट का निकोटीन
उचित मूल्य की दुकानों में
चूल्हा जलाने को तो नहीं
घर जलाने को
मिल जाता है kerosene
ये बस्तियों से उठता धुंआ
ज़रा गौर करो
चूल्हे का नहीं है
ये तो लाशों के जलने की बू है
(incomplete)

Sunday, November 23, 2008

रास्ते पे...

चलना शुरू किया ही था की
सड़क के बिच
कुत्ते भौकने लगे
मैंने डर कर
रास्ता बदल लिया
वो कुत्ते अभी भी
भौंक रहे हैं
कोई और रास्ता बदल रहा होगा

Tuesday, November 18, 2008

ध्रुव तारा

मेरी जगह लेकर क्या पाओगे
मेरी तरह तनहा ही रह जाओगे
इस रौशनी का नहीं कोई ठिकाना
पछताओगे जब बादलों से ढक जाओगे
याद आएगी ये ज़मीन
जब आसमान की धूल खाओगे
मेरे जैसे किसी काम के नहीं
जान जाओगे
जब अंधेरे में अकेले बस टिमटिमाओगे
मैं अब ख़ुद नीचे नहीं आ सकता
तुम मुझे क्या नीचे लाओगे

ख़ुद लगायी बाज़ी हर बार
हर बार मैं ही हारा
कभी गौर से देखना कौन है मेरे पास
नहीं दिखेगा कोई साथी न कोई सहारा
आसमान में एक अकेला मैं ध्रुव तारा ............