About Me

I am not just what I am.Most of the times I am someone else and rest of the times I pretend to be myself.It is impossible for me to find whether I am someone else or I am pretending to be myself.some people think what they want to think about me and some people think what I want them to think about me.But no one thinks about who really I am.Not even myself.I am a nonconformist and love to be dramatic.......(aisa hi kuchh likhte hain na?) wah!!!kya likha hai...

Thursday, December 29, 2016

शायद कभी .........

मुझे पता है हर शाम तो नहीं
मगर कभी किसी शाम 

जब तनहा बैठोगे
शायद मुझे याद करोगे
की कोई एक था
जिसने रातें काटी रात भर जलकर
सुबह कभी देखी नहीं
क्योंकि सुबह तक जल जल कर
बुझ जाती थी आँखें
जिसने भीड़ में भी तनहा दिन काटे
तुम्हारी एक नज़र के सहारे
जिसने खामोश रहकर सिर्फ तुम्हें देखा 
उन काले सफ़ेद पन्नो को नहीं 
जिनमें रंग नहीं थे तुम्हारी बातों के

मुझे पता है रोज़ तो नहीं
मगर कभी किसी रोज़
जब कुछ भी  होगा सोचने को
शायद सोचोगे मेरे बारे में
की कोई एक था
जिसकी मुस्कराहट आती थी
तुम्हारी हंसी से
जिसे शोर में भी 

सुनाई देती थी तो बस 
तुम्हारी ही बातें 
जिसने धागे से बाँध कर उड़ाए थे 
अपने शब्द
और लटाई थमा दी तुम्हारे हाथों में

मुझे पता है कभी नहीं
फिर भी सोचता हूँ शायद कभी
जाऊं तुम्हारी नींद में
किसी बुरे ख़ाब के बीच में
तब शायद तुम्हें यकीन हो
की कोई था
जो कुछ पल साथ तो था मगर
खो गयी उसकी आवाज़ें 
तुम्हारी हँसी के शोर में


ये सब होगा नहीं कभी 
मुझे पता है 
मगर फिर भी सोचता हूँ 
शायद कभी....... 

Wednesday, December 28, 2016

क्या आप गुस्से में हैं?

क्या आप गुस्से में हैं?
ना, हम तो बहुत खुश हैं 
एक बड़े से घर में रहते हैं 
अकेले 
गुस्से में तो तब थे 
जब तुम्हारी पटर-पटर से 
हमारे कान दुःख जाते थे 
अब तो खुश हैं 
खाली घर में सिर्फ 
हमारी ही आवाज़ गूंजती है

गुस्से में तो तब थे 
जब कोई था जिसपर खर्च करना था 
मगर पैसे नहीं थे 
अब तो खुश हैं 
पैसे भी हैं 
और कोई है भी नहीं 
जिसपर खर्च करें 

भाई गुस्से में तो तब थे 
जब सारा दिन तुम्हें 
आईने के सामने देख के 
हमारा सर दुःख जाता था 
अब तो बहुत खुश हैं 
हमारे बड़े से घर में 
कोई आइना ही नहीं है 

गुस्से में तो तब थे 
जब तुम हमें किसी और की तरफ 
देखने नहीं देती थी 
अब तो बहुत खुश हैं 
चारों तरफ देखते रहते हैं 
और तुम कहीं दिखाई नहीं देती!!!!!

Tuesday, December 27, 2016

याद है???????

तुम्हारी एक झलक के लिए 
हमने क्या क्या नहीं किया 
बचपन में सर्दियों में भी 
तुम्हारे घर के सामने वाले पेड़ से 
आम तोड़े 
जवानी आयी तो तुम्हारी कसम 
तुम्हें नहीं पता हमने 
कितने जरूरी काम छोड़े 

हमें ज़रा भी ठण्ड नहीं लगती थी 
जब एक बार भी तुम्हारी आवाज़ 
ठन्डी दीवार से सटी मेरी कान 
चूम जाया करती थी 
हमें तकलीफ नहीं होती थी 
जब सतरह किलोमीटर दूर से भी 
तुम्हारी हंसी सुन के हमारी बाइक 
घूम जाया करती थी 

ये तो याद  होगा की 
तुम्हें एक बार मिलने को 
मैं तीन रातों तक जागा था 
मगर ये याद नहीं होगा की 
तुम्हें एक बार मिलने को 
मैं भरी दोपहरी 
नंगे पाँव भी भागा था 

अब न मिलना कभी 
अगर कहीं मिल गयी 
तो माँ कसम मुँह तोड़ देंगे!!!!!!!

बातें बहकी बहकी

अशिक्षा, अपराध, भ्रष्टाचार???????
कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हो?
आओ जश्न मनाएं
अपनी आज़ादी का



सरकार ने ठेके खोल रखे हैं शराब के
आओ पूरा करें अपना नागरिक कर्त्तव्य

सरकार की कमाई बढ़ा के



तुम कहाँ छुपे बैठे हो?
कहाँ चिंता किये बैठे हो
बढती बेरोज़गारी और अशिक्षा पे

आओ जश्न मनाएं

शेयर बाज़ार के बढ़ते भावों पे



कहाँ सुबह सुबह 
नक्सालियों की खबर खोल कर बैठ गए
वो तो हैं ही मरने और मारने को

उन्हें भी नहीं पता किसे और क्यों

तुम तो वो रंगीन पन्ना खोलो

जिसमें चकाचौंध है फ़िल्मी दुनिया की

अम हमें क्या करना अगर बिहार में बाढ़ आई है तो

अब बाढ़ है तो आएगी ही, हर साल आती है

तुम तो पता करो दीपिका आजकल किसके साथ है



क्या फरक पड़ता है हमें
अगर किसी मंत्री ने घोटाला किया है तो

वो नहीं करता कोई और करता

अच्छा है कोई तो अमीर हुआ

गरीबों का क्या है, वो तो गरीब ही मरेंगे

तुम तो खोजो किस दूकान में सेल लगी है



तुम भी सुबह सुबह
कैसी बहकी बहकी बातें करते हो

आओ जश्न मनाएं

अपनी आज़ादी का

जब भी तुम साथ होती हो...........

जब भी तुम साथ होती हो
तो सोचता हूँ
की किसको धोखा दे रहा हूँ
तुम्हें या ख़ुद को
या उस भरोसे को जो मुझे
ख़ुद पे कभी था ही नहीं
या उन सितारों को जो
रात भर मुझसे बातें करते थे
धोखा तो मैं अपनी उस
तन्हाई को भी दे रहा हूँ
जो हमेशा मेरे साथ रहती थी

जब भी तुम साथ होती हो
तो सोचता हूँ
की तुम क्यों मेरे साथ नहीं
तुम्हें क्यों पता नहीं
की क्या है मेरे दिल में
मुझे देखती हो फिर भी क्यों
तुमें कुछ नज़र नहीं आता
मुझसे बात करती हो फिर भी क्यों
तुम्हें कुछ सुनाई नहीं देता

जब भी तुम साथ होती हो
तो सोचता हूँ
मेरा किरदार लिखा ही क्यों गया
तुम्हारी कहानी में
अब लिख ही दिया तो 
इतनी देर क्यों लगी
मुझे तुम तक आने में
ये गलती है लिखनेवाले की
फ़िर क्यों वो सज़ा मुझको दे रहा है

जब भी तुम साथ होती हो
तो सोचता हूँ
की कुछ न सोचूं 
मगर फिर सोचता हूँ 
की बोलें भी ना सोचें भी ना 
तुम्हारे बाप का राज है क्या?

Monday, December 26, 2016

लड़की का दुपट्टा

वो बस्ती से जो उठ रहा है धुआं जैसा
वो तो जलते हुए लाशों की बू है. 

किसी ने लड़की का दुपट्टा खिंचा 
किसी ने आग लगा दी
हो गया हिसाब  बराबर 

अब कौन बड़ा गुनहगार है 
इसका फैसला तो 
कर गए हैं कुछ लोग 
पिछले ज़माने में ही 
जज साहब तो बस 
उन्ही का लिखा पढ़ जाते हैं 

अब आपको सही लगे या गलत 

मगर उनकी कमीज़ नहीं खिंचता कोई 
सबकी नज़र वहीँ 
लड़की के दुपट्टे पर ही होती है 

Sunday, December 25, 2016

Untitled

अपने हिसाब से तो चला कर देखा
मगर ये चलती नहीं रुक जाती है
सच में, खिंचता हूँ तो ठहर जाती है

चलिए दुनिया आपके हिसाब से चलाते हैं
आपका जब मन करे याद करो
आपका जब मन करे भूल जाओ
आपका जब मन करे देखो
आपका जब मन करे मुस्कुराओ
आपका जब मन करे हंसो
आपका जब मन करे गुस्साओ

मगर आपकी दुनिया तो आपकी है
शिकवा हम क्या ही करेंगे
और भला किस से करेंगे
इसलिए नहीं करेंगे
वो आपके सामने वाली हमारी कुर्सी खाली है
और शायद खाली ही रहेगी
आपके लिए

मगर हमने भी सोच लिया है
आइये इस बार दुनिया आपके हिसाब से चलाते हैं
आपका जब मन करे याद करो
आपका जब मन करे भूल जाओ

क्योंकि हमसे तो ये चलती नहीं
रुक जाती है 



Thursday, December 22, 2016

वो क्या कह गयी थी?

सुना था तुमने
वो क्या कह गयी थी
पहले भी कई बार
उसने कहा था मुझसे
आंसूं भरी आँखों से


मैंने कोशिश की थी
आज भी
आंसूं देखने की
मगर वो वहां थे नहीं
या मैं देख नहीं पाया
चश्मा जो था
उसकी आँखों पे
लेकिन चश्मा तो वहीँ होता था
पहले भी


हाथ तो उसने छुड़ाया था
पहले भी कई बार
फिर क्यों आज ही
कुछ छूटता लग रहा था
पहले भी कई बार
तोडा था मैंने उम्मीदों को
फिर क्यों आज ही
कुछ टूटता लग रहा था


जिस दीवार को कुरेद कुरेद कर
सेंध लगायी थी मैंने
वो आज मजबूत हो गयी थी
मेरी उँगलियों से
निकलता खून
क्यों आज उसे दिखता नहीं
पहले काँटा भी चुभे तो
आसमान सर पर होता था


हमेशा उसने मुझे संभाला था 
बच्चों जैसे 
अगर मैं थोड़ा भी उदास होता था 
फिर आज कैसे 
मुझे रोता छोड़कर निकल गयी वो 

कहा तो था उसने कुछ 
लेकिन पता नहीं क्यों 
मैं आज भी कुछ नहीं सुन पाया

अर्ज़ किया है

फिर सूरज निकलेगा थोड़ी देर में
थोड़ी देर में फिर सहर होगी
सबके हिस्से आएगी सुबह
हमारे हाथ फिर ख़ाली दोपहर होगी 

आदतन फिर रुसवा होंगे भरी महफ़िल में
शर्त ये है की वो महफ़िल तेरे घर होगी
जिंदा रहने या न रहने में फर्क नहीं अब
फर्क कोई करे तो 

वो बस तेरी एक नज़र होगी
सुना है सबकी मौत का एक वक़्त मुक़र्रर है
मर जाऊं वक़्त के पहले 

गर मेरी कब्र तेरी रहगुज़र होगी

Tuesday, December 20, 2016

तुम खूबसूरत लगती हो

तुम खूबसूरत लगती हो
जब भी तुम हँसती हो
लगता है जैसे एक साथ
हजारों बच्चे खिल खिला के हँसे हों
सर्कस के जोकर के खेल पे
जैसे सूखे पड़े खेत में
बारिश की पहली बूँद देख कर
खुशी आती है किसानों के मुँह पे

तुम खूबसूरत लगती हो
तब भी जब तुम उदास होती हो
जैसे सांझ ढल रही हो
और चरवाहे की गायें
सरहद पार चली गयीं हों
जैसे पतझड़ की उमस भरी दोपहरी में
हाथ दुःख गए हों पंखा झलते झलते
जैसे सारे गुलाब मुरझा गए हों
सूरज की तपती रौशनी में

तुम खूबसूरत लगती हो
जब भी तुम मुझसे बातें करती हो
लगता है किसी शराबी आशिक ने
बोतल मुँह से लगा ली हो 
लगता है जैसे बाँध तोड़ कर
नदी घुस गई हो गाँव में
लगता है जैसे किसी बच्चे को 
मनचाहा खिलौना मिल गया हो 

तुम खूबसूरत लगती हो
तब भी जब तुम मुझसे बात नहीं करती हो 
लगता है समंदर ने कई राज़ छुपा रखे हों
लगता है पेड़ इंतज़ार कर रहे हों
आंधी का झुमने के लिए
लगता है समय भी चलना छोड़कर
तुम्हारे बोलने का इंतज़ार कर रहा हो 


तुम खूबसूरत लगती हो
जब भी तुम मुझे देखती हो
ऐसा लगता है जैसे उडती हुई पतंग
जानना चाहती हो की
उसकी डोर किसने थाम रखी है
जैसे सर्दियों में धुप आती है
घर के आँगन में
जैसे रात के अंधेरे में राही को
दूर कहीं जलता हुआ दीया दिखा हो

तुम खूबसूरत लगती हो
तब भी जब तुम मुझे नहीं देखती
लगता है जैसे पूनम की रात में
चाँद ने रौशनी देने से मना कर दिया हो
जैसे थके हारे किसान की बीवी ने
उसे रोटी दिया हो
जैसे माँ ने थप्पड़ लगाया हो
अँधेरा होने के बाद भी गली में खेलते
अपने बच्चे को

तुम खूबसूरत ही लगोगी
तब भी जब मैं तुम्हें देख नहीं पाऊंगा
रेगिस्तान की तरह
जहाँ सिर्फ़ सुनहरी रेत दिखाई देती है
मैं तुम्हें तलाश करूँगा और तुम दिखोगी
दूर कहीं ठंडे पानी की झील की तरह
जो वहां होती ही नहीं

UNTITLED

वो सुबह की धूप से कहा है मैंने
की तुम्हें जलाया करे
ज़रा देर से निकले


भागते भागते तुम्हारे पैर
अगर थक जाएँ
तो पास के पेड़ों को कहा है की

पीछे की सड़क को ढक दें सूखे पत्तों से

फिर तुम्हें ठण्ड लगी 
तो शामत आएगी उन हवाओं की
जिनको कहा है मैंने गर्म रहने को


सुबह आँख खुली मेरी तो
शिकार करूँगा उन पंछियों का
जिनको कह रखा है मैंने
तुम्हारे हंसने की आवाज़ मुझ तक लाने को


अगर आज रात नींद से तुम्हें जगाया
किसी भी सपने ने तो मुझसे कहना
सच कहता हूँ 

सारे सपने दुश्मन हो जायेंगे मेरे