कभी चीखती चिल्लाती
बाज़ार में खोये बच्चे की तरह
किसी को तलाशती
कभी धीमी सहमी सी
रात को निकले चोर के
कदमो की आहट की तरह
कभी पवनचक्की की
आवाज़ की तरह रुक रुक कर आती
कभी हारे हुए जुआरी की तरह
झुंझलाई हुई दबी सी
कभी शराबी की तरह
टूटती हुई लडखडाती सी
कभी हक जमाती हुई
मकान मालिक के जैसी
कभी छत से टपकते
पानी की बूंदों सी
मैंने देखा है तुम्हारी सारी आवाज़ों को
मेरे कमरे की बंद खिड़की के कांच से
टकराकर वापस जाते हुए
Friday, November 13, 2009
Sunday, November 8, 2009
आओ हवा दें
आओ थोडी हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई थी
इस लडाई की
आओ आज फ़िर
किसी मासूम हाथ में
तलवार दें
आओ आज किसी
दुल्हन की मेहंदी को
बदल दें खून के
लाल रंग में
आओ आज फ़िर
वो बनिए की दुकान
लुट लें जो अपनी
बेटी से बात नहीं करने देता
चलो सब साथ
एक साथ आवाज़ बुलंद करें
उस कातिल को
बचाने के लिए
जिसको फांसी हुई है
आओ आज और
घी डालें
उस नफरत
की आग में
बिना इसके
नतीजा नहीं निकल
पायेगा इस लडाई का
तो आओ आज फ़िर
हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई
इस लडाई की
इसी बहाने
पड़ताल तो हो जायेगी
उन रंजिशों की
जो वजह हैं
इस लडाई की
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई थी
इस लडाई की
आओ आज फ़िर
किसी मासूम हाथ में
तलवार दें
आओ आज किसी
दुल्हन की मेहंदी को
बदल दें खून के
लाल रंग में
आओ आज फ़िर
वो बनिए की दुकान
लुट लें जो अपनी
बेटी से बात नहीं करने देता
चलो सब साथ
एक साथ आवाज़ बुलंद करें
उस कातिल को
बचाने के लिए
जिसको फांसी हुई है
आओ आज और
घी डालें
उस नफरत
की आग में
बिना इसके
नतीजा नहीं निकल
पायेगा इस लडाई का
तो आओ आज फ़िर
हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई
इस लडाई की
इसी बहाने
पड़ताल तो हो जायेगी
उन रंजिशों की
जो वजह हैं
इस लडाई की
कुछ तो है एक जैसा
राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है,
लोग लाश लेकर जा रहे थे
भीड़ अच्छी थी
बूढा चौकीदार जो मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था
लाश को एक टक देख रहा था
मैं सोच में पड़ गया की वो क्या सोच रहा है
सोच रहा होगा की
उसका वक्त भी आनेवाला ही होगा
फ़िर उसकी आंखों में
शायद मैंने कुछ बूँदें देखी थी आँसू की
ये डर मौत का नहीं था
डर शायद ये था की
उसकी अन्तिम यात्रा में लोग होंगे की नहीं
राम नाम लेने वाले
उसके जाने के बाद रोने वाले
मरने के बाद ही सही
उसकी तारीफ़ करने वाले
उसकी आंखों में अब बेचैनी आ गई थी
मैं आगे बढ़ गया
आगे मैंने जिसको भी देखा
बड़ी गाड़ी में बैठे सज्जन, रिक्शेवाला, कॉलेज जाते लड़के
पानवाला, पुलिसवाला, अमीर, गरीब
सबकी आंखों में वही डर वही बेचैनी दिखी
आइना देखा तो वहां भी वही आँखें थी
वैसे ही डरी बेचैन
सोच कर खुश हुआ की
कुछ तो एक जैसा है हम इंसानों में आज भी
लोग लाश लेकर जा रहे थे
भीड़ अच्छी थी
बूढा चौकीदार जो मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था
लाश को एक टक देख रहा था
मैं सोच में पड़ गया की वो क्या सोच रहा है
सोच रहा होगा की
उसका वक्त भी आनेवाला ही होगा
फ़िर उसकी आंखों में
शायद मैंने कुछ बूँदें देखी थी आँसू की
ये डर मौत का नहीं था
डर शायद ये था की
उसकी अन्तिम यात्रा में लोग होंगे की नहीं
राम नाम लेने वाले
उसके जाने के बाद रोने वाले
मरने के बाद ही सही
उसकी तारीफ़ करने वाले
उसकी आंखों में अब बेचैनी आ गई थी
मैं आगे बढ़ गया
आगे मैंने जिसको भी देखा
बड़ी गाड़ी में बैठे सज्जन, रिक्शेवाला, कॉलेज जाते लड़के
पानवाला, पुलिसवाला, अमीर, गरीब
सबकी आंखों में वही डर वही बेचैनी दिखी
आइना देखा तो वहां भी वही आँखें थी
वैसे ही डरी बेचैन
सोच कर खुश हुआ की
कुछ तो एक जैसा है हम इंसानों में आज भी
Tuesday, November 3, 2009
पागल ने लिखा था ....
भूखे रोटी को रोते हैं
जिनके पेट भरे हैं वो इंक़लाब की बातें करते हैं
तलवारें निकल गई हैं सबकी
काटेंगे किसको पता नहीं उनको
कौन है गुनहगार
आज जिनके घर में रौशनी है
वो अंधेरे की दलाली करते हैं
दुनिया को एक करने की लडाई
वो जीत गए हैं
फासला कम हो गया है
चोर और पुलिस के बीच का
घर और बाज़ार के बीच का
पहले परेशां रहते थे गर
बाज़ार में घर हो
आज खुश रहते हैं घरों में बाज़ार खुल गए हैं
समाज को बदल सकने वाले
कामयाब हो गए ख़ुद को बदलने में
भूखे दुखी हैं इसलिए नहीं की
आजकल काम नहीं मिलता
इसलिए की आजकल लोग काम देने की बातें करते हैं
भीख देते नहीं आसानी से
सड़कें आज पक्की हो गई हैं
सारे दलदल ऊँची इमारतों में रहते हैं आजकल
बड़े बुजुर्ग कहते हैं ज़माना बदल गया है
गुजरा वक्त तो मैंने देखा नहीं
हाँ मगर किसी पागल की एक किताब पढ़ी थी
लिखा था उस वक्त भी सब कुछ ऐसा ही था
सब कुछ ऐसा ही था
और उस ज़माने में भी उसे पागल ही कहते थे
जिनके पेट भरे हैं वो इंक़लाब की बातें करते हैं
तलवारें निकल गई हैं सबकी
काटेंगे किसको पता नहीं उनको
कौन है गुनहगार
आज जिनके घर में रौशनी है
वो अंधेरे की दलाली करते हैं
दुनिया को एक करने की लडाई
वो जीत गए हैं
फासला कम हो गया है
चोर और पुलिस के बीच का
घर और बाज़ार के बीच का
पहले परेशां रहते थे गर
बाज़ार में घर हो
आज खुश रहते हैं घरों में बाज़ार खुल गए हैं
समाज को बदल सकने वाले
कामयाब हो गए ख़ुद को बदलने में
भूखे दुखी हैं इसलिए नहीं की
आजकल काम नहीं मिलता
इसलिए की आजकल लोग काम देने की बातें करते हैं
भीख देते नहीं आसानी से
सड़कें आज पक्की हो गई हैं
सारे दलदल ऊँची इमारतों में रहते हैं आजकल
बड़े बुजुर्ग कहते हैं ज़माना बदल गया है
गुजरा वक्त तो मैंने देखा नहीं
हाँ मगर किसी पागल की एक किताब पढ़ी थी
लिखा था उस वक्त भी सब कुछ ऐसा ही था
सब कुछ ऐसा ही था
और उस ज़माने में भी उसे पागल ही कहते थे
Sunday, November 1, 2009
उमर क़ैद
जिस तालीम की इज़ाद की गई थी
लोगों की आज़ादी के लिए
उसी तालीम ने मुझे उमर क़ैद की सज़ा सुनाई है
गुनाह इतना है की
मैंने ऐतबार किया उनकी किताबों पर
और उन किताबों ने ला खड़ा किया
मुझे इस बाज़ार में
अब उम्र भर इस बाज़ार की दीवारों को
नाखूनों से नोचता रहूँगा
मगर बाहर जा न सकूँगा
कान झाकेंगे उन दीवारों के पार
किसी की आवाज़ सुनने को
मगर सुनाई देंगी सिर्फ़
हाथ में थमे फावडों की खनखन
वक्त गुज़रेगा लड़ते हुए उन फेंके हुए
मांस के टुकडों को झपटने के लिए
आँखें रंग पहचानना भूल जाएँगी
और ताकेंगी सिर्फ़ सफ़ेद आसमान को
इस इंतज़ार में की कब खुदा नीचे आए और कहे
चल तेरी ज़मानत हो गई है
लोगों की आज़ादी के लिए
उसी तालीम ने मुझे उमर क़ैद की सज़ा सुनाई है
गुनाह इतना है की
मैंने ऐतबार किया उनकी किताबों पर
और उन किताबों ने ला खड़ा किया
मुझे इस बाज़ार में
अब उम्र भर इस बाज़ार की दीवारों को
नाखूनों से नोचता रहूँगा
मगर बाहर जा न सकूँगा
कान झाकेंगे उन दीवारों के पार
किसी की आवाज़ सुनने को
मगर सुनाई देंगी सिर्फ़
हाथ में थमे फावडों की खनखन
वक्त गुज़रेगा लड़ते हुए उन फेंके हुए
मांस के टुकडों को झपटने के लिए
आँखें रंग पहचानना भूल जाएँगी
और ताकेंगी सिर्फ़ सफ़ेद आसमान को
इस इंतज़ार में की कब खुदा नीचे आए और कहे
चल तेरी ज़मानत हो गई है
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