मेरे अन्दर जो रहता है एक शख्श
उसे शौक है इन्कलाब लाने का
चाहता है की मैं भी उसकी तरह बन जाऊं
मगर मैं उसकी तरह विचार नहीं खाता
मुझे भूख लगती है
वो चाहता है की मैं उसके इशारों पे चलूँ
ग़ुलाम बन जाऊं उसका
मगर मैं तो पहले से ही जकड़ा हूँ बेड़ियों में
वो मुझे खोल नहीं सकता
क्योंकि उसके तो हाथ ही नहीं
उसे तो जरूरत होती है मेरे हाथों की
जिन्हें मैं कब का काट चुका हूँ
वो चाहता है की मेरे गले से भी गीत निकले
लोगों को जगाने वाले, क्रांति के,प्यार के
मगर मेरे गले का रास्ता तो
मेरी डरी सहमी आवाज़ ने हथिया रखा है
मैं कैसे उसे समझाऊं की
नहीं बन सकता मैं उसकी तरह
अब जब मुझे उसकी आवाजा तंग करती है
उसे सुला देता हूँ शराब पिला के
Tuesday, February 2, 2010
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