ठहाकों ठहाकों की प्रतिध्वनि में
दब कर रह गयी
विचारों की सत्यता
प्रश्नों के बुने जाल में
देखने लायक है
उत्तर की विवशता
जीवन के एक एक क्षण को
और लम्बा करता
नसों में बंद
सिगरेट का निकोटीन
उचित मूल्य की दुकानों में
चूल्हा जलाने को तो नहीं
घर जलाने को
मिल जाता है kerosene
ये बस्तियों से उठता धुंआ
ज़रा गौर करो
चूल्हे का नहीं है
ये तो लाशों के जलने की बू है
(incomplete)
Tuesday, November 25, 2008
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