सुबह हुई तो सोचा पड़ोसी से पूछूं दिन कौन सा है ,
फ़िर ये सोच कर चुप रह गया की उन्ही सातों में से ही तो एक होगा ,
यूँ एक एक कर के गुज़र गया ज़माना सा लगता है ,
बहार निकल कर देखता हूँ तो ,
ये ज़मीन और वो आस्मां भी पुराना सा लगता है .
Wednesday, May 28, 2008
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2 comments:
ab toh nind khulne ka pacchtawa aur subah hone ka darr lagta hai,
yahan toh insaano ka sharir bus zinda laash banke bhatak ta hai!!
फ़िर ये सोच कर चुप रह गया की उन्ही सातों में से ही तो एक होगा ,
kya bat hai...lovely!!!!!!!
even apoorva is so good.
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