बचपन में
एक बार सर्दियों में
गाँव गया था
जाड़े की वो रात
अमावस थी शायद
अलाव जलाये बैठे थे हम
घेर कर
ठण्ड से बचने को
उसी रात एक कुत्ते के
रोने की आवाज़ सुनी थी
आज भी गूंजती है
कानो में
चाचा ने उसे
डंडा मारकर भगाया
और वापस आकर
अलाव में और
पुवाल डाला
देर रात तक सब बैठ कर
देश विदेश की बात
करते रहे
कम्बल ओढे
आग पर हाथ सेकते रहे
सुबह उठ कर
मैं चीखा था
वो कुत्ता मरा हुआ
वहीँ बुझे अलाव के
बगल में पड़ा था
उसके रोने की आवाज़
आज भी गूंजती है
कानो में
उसकी आंखों से
टपकते आँसू
जमे नहीं थे सुबह तक .....
Tuesday, November 25, 2008
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1 comment:
lagta hai hum abhi rone lagenge..its so touchy,ab isko mera usual kutta-pyar mat samajh lena..achha laga dekhkar ki koi kitne sensible ho sakta hai..kya likha hai tumne..sahi hai hum log apne aaspas chhodkar aur na jane kis kis bat ki fikr kiyr rahte hain!!
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