पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मगर मैं जानता हूँ इसका मतलब ,
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा ,
मैंने देखि है वो एक दाम की दूकान ,
जहाँ शरीर और भावनाएं एक ही खिड़की पे बिकती हैं ,
मगर वहां जाने के लिए ,
मुझे ख़ुद को सूली पे चढाना होगा ,
मैं जनता हूँ उस बाज़ार का रास्ता ,
जेहन सुदा होता है लाशों का ,
मगर वहां मुनाफे के लिए ,
मुझे ख़ुद को ख़ुद से लड़ाना होगा ,
कभी सोचता हूँ क्यों मरती है माँ
अपने भूख से रोते बच्चे को ,
मगर ये समझने के लिए
मुझे समझ कहीं और से लाना होगा ,
इसीलिए खड़ा हूँ समझ के बाज़ार में ,
मगर वो कहते हैं
पैसों से सबकुछ नहीं ख़रीदा जा सकता ,
मैं जानता हूँ इसका मतलब
मुझे अपनी बोली को और बढ़ाना होगा
Wednesday, May 28, 2008
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