जले हुए सिगरेट के टुकड़े
कुछ फटे पुराने अख़बार
कुछ पुरानी खाली बोतलें
और इसी भूल भुलैया में
मुझे खोजती मेरी ज़िन्दगी
कल शाम मिली थी मुझको
उसी तंग गली के नुक्कड़ पे
जहाँ मैंने उसका गला घोटा था
जब ज़िन्दगी और मैं साथ रहते थे
मुझे वो वक्त याद दिला रही थी
मेरी यादों पे जमी राख हटा रही थी
कल फ़िर मैंने बेरुखी से मुँह फेर लिया
सिगरेट के धुंए में ख़ुद को घेर लिया
कल फिर एक जाम बनाया
और ज़िन्दगी को उसी में डुबाया
कल फिर उसे तड़पता देख कर
खुशी से रोया हूँ मैं
कल फिर अपना ही खून कर के
चैन से सोया हूँ मैं
Sunday, August 31, 2008
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1 comment:
kal phir apna hi khoon kar ke
chain se soya hoon main.
yaar,yeh line toh matlab.. tere endings thought provoking aur sad hote hai yaar.. senti kar deta hai.. khilwaad hai yeh toh.. itna involve kaise karta hai yaar tu.. sahi hai..
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