दिन गुजरा पीछा करते हुए
अपनी परछाईं का ,
शाम ढलते ही परछाईं भी डूब गई ,
गुज़र गई शाम रात के इंतज़ार में
रोज़ की तरह वो शाम भी हमारी खूब गई ।
रात होते ही महसूस हुआ की अँधेरा है ,
दिखता नहीं कुछ भी
इससे अच्छा तो अपना वोही पुराना सवेरा है ,
हार कर निकला मैं रौशनी की तलाश में ,
रौशनी मिली भी तो ऊपर आकाश में ,
जी तो चाह की एक तारा तोड़ लाऊं ,
मगर फ़िर ख्याल आया की ले तो आऊँ
पर अंधेरे में रास्ता किसे दिखाऊँ .
ढूँढा मगर कोई न मिला जिसे जरूरत हो अपनी ,
इस शहर में सबके पास हैं रोशनियाँ अपनी अपनी .
वापस आया उसी कमरे में अपने
गुज़र गई रात भी बस जागती आंखों से देखते सपने .
Wednesday, May 28, 2008
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1 comment:
जी तो चाह की एक तारा तोड़ लाऊं ,
मगर फ़िर ख्याल आया की ले तो आऊँ
पर अंधेरे में रास्ता किसे दिखाऊँ
sach me..kya soch hai..ढूँढा मगर कोई न मिला जिसे जरूरत हो अपनी ,
इस शहर में सबके पास हैं रोशनियाँ अपनी अपनी .
वापस आया उसी कमरे में अपने
गुज़र गई रात भी बस जागती आंखों से देखते स
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