आज गले में कुछ खराश है
शायद गई रात नींद में चीखा था मैं
ये रात भी अजीब है
ख़तम ही नहीं होती
रोज़ इसे काट काट कर छोटा करता हूँ
फ़िर उतनी ही लम्बी हो जाती है
कल इसी को काट ते हुए पता नहीं कब सो गया
उसी स्याह रात में अपने अन्दर ही कहीं खो गया
हैरान हूँ मैं की आंखों से
आंसू क्यों नहीं बहता
गला ठीक होता तो सबको ये कहता
की अपने अन्दर अब मैं नहीं रहता
Thursday, October 2, 2008
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1 comment:
as usual..
kya poem hai.. last line toh waah..
yaar tere mein woh O'Henry ke skills hai.. climax hamesha badiya hota hai..
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