आज भी उसी बस अड्डे पर खड़ा हूँ
जहाँ तुम मुझे छोड़ गई थी
वहां कितनी ही कहानियों को
बनते और बिगड़ते देखा है
मैंने वहीँ चाँद और सितारों को
झगड़ते देखा है
देखा है चाबुक की चोट पर
सपनो को भागते हुए
और रौशनी के इंतज़ार में
रात को रात भर जागते हुए
यादों के लगाम को टूट ते देखा है
और ठीक वहीँ पर वक्त को
हाथ से छुट ते देखा है
याद है उस बस अड्डे की भीड़ में
मुझे खोने से डरती थी तुम
कहीं कोई छीन न ले जाए इसलिए
मेरा हाथ पकड़ कर चलती थी तुम
फिर कैसे भूल गई की वहीँ
एक अरसे से खड़ा हूँ मैं
कभी आकर एक ठोकर ही मार दो
कोने में पत्थर सा पड़ा हूँ मैं .
Monday, July 28, 2008
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