वो बुढ़िया जो
हमारे घर के
पीछे रहती थी
सब उसे डायन कहते थे
छोटी झोपडी में
वो अकेली रहती थी
कोई उसके पास नहीं जाता
सब डरते थे उससे
मुझे आज भी याद है
दादी ने फटकारा था
माँ ने मारा था मुझको
जब एक दिन
मैंने उसके घर
जाकर रोटी खायी थी
लकड़ी की आंच पर
उसने मेरे लिए
रोटी पकाई थी
रोती हुई अपने बेटे
की कहानी बताई थी
मैं डरा नहीं था
पर आज डरता हूँ
फिर उस झोपडी
में जाने से
वो बुढ़िया तो
अकेले मर गई
पर उसकी रोटी का स्वाद
आज भी याद है मुझको
उसकी सिसकती आवाज़
आज भी याद है मुझको
Wednesday, November 26, 2008
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1 comment:
kitna sach hai na..
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