राम नाम सत्य है, राम नाम सत्य है,
लोग लाश लेकर जा रहे थे
भीड़ अच्छी थी
बूढा चौकीदार जो मुश्किल से खड़ा हो पा रहा था
लाश को एक टक देख रहा था
मैं सोच में पड़ गया की वो क्या सोच रहा है
सोच रहा होगा की
उसका वक्त भी आनेवाला ही होगा
फ़िर उसकी आंखों में
शायद मैंने कुछ बूँदें देखी थी आँसू की
ये डर मौत का नहीं था
डर शायद ये था की
उसकी अन्तिम यात्रा में लोग होंगे की नहीं
राम नाम लेने वाले
उसके जाने के बाद रोने वाले
मरने के बाद ही सही
उसकी तारीफ़ करने वाले
उसकी आंखों में अब बेचैनी आ गई थी
मैं आगे बढ़ गया
आगे मैंने जिसको भी देखा
बड़ी गाड़ी में बैठे सज्जन, रिक्शेवाला, कॉलेज जाते लड़के
पानवाला, पुलिसवाला, अमीर, गरीब
सबकी आंखों में वही डर वही बेचैनी दिखी
आइना देखा तो वहां भी वही आँखें थी
वैसे ही डरी बेचैन
सोच कर खुश हुआ की
कुछ तो एक जैसा है हम इंसानों में आज भी
Sunday, November 8, 2009
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