आओ थोडी हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई थी
इस लडाई की
आओ आज फ़िर
किसी मासूम हाथ में
तलवार दें
आओ आज किसी
दुल्हन की मेहंदी को
बदल दें खून के
लाल रंग में
आओ आज फ़िर
वो बनिए की दुकान
लुट लें जो अपनी
बेटी से बात नहीं करने देता
चलो सब साथ
एक साथ आवाज़ बुलंद करें
उस कातिल को
बचाने के लिए
जिसको फांसी हुई है
आओ आज और
घी डालें
उस नफरत
की आग में
बिना इसके
नतीजा नहीं निकल
पायेगा इस लडाई का
तो आओ आज फ़िर
हवा दें
उन रंजिशों को
जिनसे शुरूआत हुई
इस लडाई की
इसी बहाने
पड़ताल तो हो जायेगी
उन रंजिशों की
जो वजह हैं
इस लडाई की
Sunday, November 8, 2009
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