जिस तालीम की इज़ाद की गई थी
लोगों की आज़ादी के लिए
उसी तालीम ने मुझे उमर क़ैद की सज़ा सुनाई है
गुनाह इतना है की
मैंने ऐतबार किया उनकी किताबों पर
और उन किताबों ने ला खड़ा किया
मुझे इस बाज़ार में
अब उम्र भर इस बाज़ार की दीवारों को
नाखूनों से नोचता रहूँगा
मगर बाहर जा न सकूँगा
कान झाकेंगे उन दीवारों के पार
किसी की आवाज़ सुनने को
मगर सुनाई देंगी सिर्फ़
हाथ में थमे फावडों की खनखन
वक्त गुज़रेगा लड़ते हुए उन फेंके हुए
मांस के टुकडों को झपटने के लिए
आँखें रंग पहचानना भूल जाएँगी
और ताकेंगी सिर्फ़ सफ़ेद आसमान को
इस इंतज़ार में की कब खुदा नीचे आए और कहे
चल तेरी ज़मानत हो गई है
Sunday, November 1, 2009
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