भूखे रोटी को रोते हैं
जिनके पेट भरे हैं वो इंक़लाब की बातें करते हैं
तलवारें निकल गई हैं सबकी
काटेंगे किसको पता नहीं उनको
कौन है गुनहगार
आज जिनके घर में रौशनी है
वो अंधेरे की दलाली करते हैं
दुनिया को एक करने की लडाई
वो जीत गए हैं
फासला कम हो गया है
चोर और पुलिस के बीच का
घर और बाज़ार के बीच का
पहले परेशां रहते थे गर
बाज़ार में घर हो
आज खुश रहते हैं घरों में बाज़ार खुल गए हैं
समाज को बदल सकने वाले
कामयाब हो गए ख़ुद को बदलने में
भूखे दुखी हैं इसलिए नहीं की
आजकल काम नहीं मिलता
इसलिए की आजकल लोग काम देने की बातें करते हैं
भीख देते नहीं आसानी से
सड़कें आज पक्की हो गई हैं
सारे दलदल ऊँची इमारतों में रहते हैं आजकल
बड़े बुजुर्ग कहते हैं ज़माना बदल गया है
गुजरा वक्त तो मैंने देखा नहीं
हाँ मगर किसी पागल की एक किताब पढ़ी थी
लिखा था उस वक्त भी सब कुछ ऐसा ही था
सब कुछ ऐसा ही था
और उस ज़माने में भी उसे पागल ही कहते थे
Tuesday, November 3, 2009
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