कभी चीखती चिल्लाती
बाज़ार में खोये बच्चे की तरह
किसी को तलाशती
कभी धीमी सहमी सी
रात को निकले चोर के
कदमो की आहट की तरह
कभी पवनचक्की की
आवाज़ की तरह रुक रुक कर आती
कभी हारे हुए जुआरी की तरह
झुंझलाई हुई दबी सी
कभी शराबी की तरह
टूटती हुई लडखडाती सी
कभी हक जमाती हुई
मकान मालिक के जैसी
कभी छत से टपकते
पानी की बूंदों सी
मैंने देखा है तुम्हारी सारी आवाज़ों को
मेरे कमरे की बंद खिड़की के कांच से
टकराकर वापस जाते हुए
Friday, November 13, 2009
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