सुबह की धुप से बनती परछाईं
मुझे डरा रह थी
रात को तो ये मेरी हमसफ़र थी
जब मैं अकेला था
ये गई नहीं थी
जब मैंने इसे लात मारी थी
कल रात तो खूब खेली थी मेरे साथ
कभी कुत्ता बनती कभी चिड़िया
अब दिन में ये औरों जैसी क्यों दिख रही है
शायद कल की लात का दर्द गया नहीं
बदला ले रही है मुझसे
Sunday, October 4, 2009
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1 comment:
ab takk tu woh raat bhula nahi.. jab tu aur teri parchai dariya kinaare baatein kar rahe the.. aur doosre din galat signal dene laggi.. parchaai badal de.. khudko badal de..
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