सच बताना
मैनें कभी तुमसे कुछ माँगा था क्या?
उठते बैठते, बातों के दरमियान
शायद कभी कोई गलती हो गयी हो
मगर एक बार सोचना
मैनें कभी तुमसे कुछ माँगा था क्या?
ये रात, ये अँधेरा, ये अकेलापन
हँसते हैं मुझपे
लेकिन मुझे तुम्हारा साथ भी नहीं चाहिए था
ये उजाले भी कुछ कम नहीं
साले डराते हैं मुझको
लेकिन मैंने नहीं कहा कभी
की मेरा हाथ पकड़ लो
भागता रहता हूँ
कभी इसी उजाले और कभी
इसी अँधेरे के पीछे
पागल तो हूँ मैं
थोड़ा नहीं पूरा शायद
लेकिन सच बताओ
गलती से भी कभी
मैंने तुमसे कभी
कुछ भी माँगा था क्या?
मैनें कभी तुमसे कुछ माँगा था क्या?
उठते बैठते, बातों के दरमियान
शायद कभी कोई गलती हो गयी हो
मगर एक बार सोचना
मैनें कभी तुमसे कुछ माँगा था क्या?
ये रात, ये अँधेरा, ये अकेलापन
हँसते हैं मुझपे
लेकिन मुझे तुम्हारा साथ भी नहीं चाहिए था
ये उजाले भी कुछ कम नहीं
साले डराते हैं मुझको
लेकिन मैंने नहीं कहा कभी
की मेरा हाथ पकड़ लो
भागता रहता हूँ
कभी इसी उजाले और कभी
इसी अँधेरे के पीछे
पागल तो हूँ मैं
थोड़ा नहीं पूरा शायद
लेकिन सच बताओ
गलती से भी कभी
मैंने तुमसे कभी
कुछ भी माँगा था क्या?
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