जिन अबोध बालकों
को तुम वाणी दोगे
एक दिन वो तुम पर ही
कटाक्ष करेंगे
जिन समाज से परित्यक्त
बेचारों का
तन तुम अपनी
चादर से ढकोगे
वो तुम्हें ही बाज़ार
में नंगा करेंगे
शायद इसी तरह
मानव का विकास होता है
बन्दर से इन्सान
बन्ने की कथा को चरितार्थ
करते ये लोग
शायद येही शुद्ध
और परिपूर्ण मानव हैं
तुम कुछ भी नहीं
इनके सामने
एक आदिम युग के जानवर
मात्र उपहास का एक पात्र
जिसकी उपयोगिता बस
वो लोग ही समझते
और जानते हैं
Tuesday, November 25, 2008
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1 comment:
sushant..superb,matlab..now i m crazy for ur writing skills..is me sabse achhi bat hai..hindi ka itna achha pryog...tumne adhikanshtah hindi shabd hi chune hain..jo is simple se thought ko itni asadharan si rachna banane me poori tarah se kamyab hai.
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