बड़ी अजीब बात है ,
सबने कोयल की कूक सुनी है ,
क्या कभी किसी ने कोयल को रोते सुना है ?
तो क्या कोयल कभी रोती नहीं ?
या रोती है बिना आवाज़ किए ,अकेले में ?
मुर्गा हर रोज़ सुबह सबको जगाता ही क्यों है ?
क्या मुर्गे को किसी ने लोरी गाते सुना है कभी ?
तो क्या मुर्गा अपने बच्चों से प्यार नहीं करता ?
या फिर करता है मगर जता नहीं पाता ?
क्या सुर में गाने वाला कौवा और नादाँ लोमडी होते ही नहीं ?
या होते हैं मगर किसी और दुनिया में ?
येही सोचते सोचते रोज सुबह हो जाती है ,
सूरज को देख कर सोचता हूँ ये एक ही रस्ते पे क्यों चलता है .
क्या दूसरा कोई रास्ता इसे पाता नहीं ?
या पाता है मगर ...........
बड़ी अजीब बात है .
Wednesday, May 28, 2008
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1 comment:
i just want to know,under what circumstances you have written this?
awesome..
as i was reading down,i thought ke tu
"paid hamashe humein chaya kyu deta hai?
kabhi usko dhoop se takleef nahi hoti"..
ya phir..
"diye ki roshni"
ka bhi example dega..
magar agar tu woh deta toh woh teri poetry nahi hoti.. kisi aam kavi ki ek aur kavita hoti.. waah.. majja aa gaya..
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