शायद कोई और भी रहता है
इस मकान में
बार बार आवाज़ लगाता है
चीखता है चिल्लाता है
अजनबी सा
जब मैं सोया होता हूँ
वो भागता है बेतहाशा
पागलों की तरह
मगर उसकी आवाज़
कोई और क्यों नहीं सुनता
एक दिन खोज कर बाहर लाऊंगा उसे
ऐसा सोचा था
मगर उसे खोजते खोजते
खोता जा रहा हूँ मैं
उसी के अन्दर कहीं
अब हम दोनों की आवाज़
एक सी लगती है
उसकी चीखें अब मेरे गले से निकलती हैं
उसके आंसूं अब मेरी आँखों में दिखते हैं
Saturday, January 30, 2010
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