उस परिंदे ने उड़ते हुए मुझे आँख मारी थी
मैं समझ नहीं पाया की तूफ़ान आने वाला है
रात भर तेज़ हवाएं चलीं, बारिश हुई
मैं छत पे खड़ा भीगता और सूखता रहा
देखता रहा लोगो को भागते हुए
सन्नाटे में पेड़ों से टकरा कर
लौटती हवा डराती रही मुझे
टपकती बूंदों की आवाज़ शोर करती रही
देखा मैंने परिंदों को
उड़कर आँखों से ओझल होते हुए
मुझे लग रहा था की इस तूफ़ान के बाद
बदल जायेगा सब कुछ
सुबह सूरज के आने के बाद पता लगा
की कुछ खास नहीं बदला था
घरो की छतें तो उड़ गयी थी
मगर दीवार अब भी वहीँ खड़े थे
Monday, January 18, 2010
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