कल रात अपनी कहानी को पंख लगाया था
उड़ाने की कोशिश कर रहा था
मगर वो नहीं उड़ी
मैंने उसके पंख उतार के
वापस दराज में रख दिए
फ़िर जैसे ही तुमने कहा
अपनी कहानी सुनाओ
वो उड़ गई
बिना पंखों के
आज सुबह दिखी थी मुझे
तुम्हारी मुंडेर पे
मुझे देख कर इतरा रही थी
या शायद पहचानने की कोशिश
मैंने भी झुंझलाकर उसे पत्थर मारा
वो आसमान में पड़ा सुराख़
दिखेगा तुम्हें रात को
कहानी मिल जाए तो मुझे
दे जाना
पिंजरे में रखूँगा उसको
Sunday, October 4, 2009
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1 comment:
yaar mast likha hai.. as usual..
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