वो बैंगनी फूल जो मैं रोज़ तुम्हारे
बालों में लगाया करता था
वो फूल जिसे लेने मैं
रोज़ चार मील चलकर
रेलवे लाइन के उस पार जाता था
वही फूल जो मुरझाएं न
ये सोचकर
उन्हें पानी की बोतल में रख कर लाता था
जिन्हें देख कर तुम हंसती थी
बच्चों की तरह
उसके कांटे निकाल नहीं पाया
आजतक अपने हाथों से
वहीँ धंसे पड़े हैं
Sunday, October 4, 2009
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1 comment:
awesome yaar.. sheh.. sahi mein.. khatarnaak.. kaanta aa gaya..
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