आज फ़िर एहसास हुआ की वक्त आ गया है
अपनी दुकान कहीं और लगाने का
मगर किसी ने पीछे से आवाज़ दी
पलट कर देखा तो ये वही था
जिसने मुझे गुर सिखाये थे दुकानदारी के
हँस रहा था मुझपर
थोड़ा पास आकर कहा की धंधे के कच्चे निकले तुम
नुकसान अब नहीं सम्भाल पाओगे
बंद कर दो ये दुकान
सामान सब पुराने हैं तुम्हारे पास
तुम्हारे खरीददार अब बचे नहीं ज़्यादा
मैंने अपनी बात मान ली
सोचा कल से फ़िर नया सामान जमा करूंगा
कल से फ़िर एक नया बाज़ार खोजूंगा
Sunday, October 4, 2009
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1 comment:
arre sorry.. dukaan ki jagah duniya padh liya.. aur fir patta chala dukaan kya hai..
ek baar tu bhi dukaan ko duniya.. dukaandaari ko duniyadaari dekhke padh.. majja aaega.. aur tu khud hi hasega.. meri tarah..
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