तुम्हारे जाने के बाद भी
मैं रोज़ उसी तरह
वो बैंगनी फूल लेकर
वहां आता था
अकेला बैठता ऊँघता रहता था
सारे पंछी मुझपर हँसते थे
हवाएं नाराज़ होकर
मुझे ठोकर मारती थीं
मुझे भगाने के लिए सूरज
अपनी धूप और तेज़ कर देता
फ़िर वो ही थक कर लौट जाता था
कभी चाँद मुझे डराने के लिए
बादलों के पीछे छिप जाता था
एक बार गुस्से में मैंने
चाकू से कांटे निकलने की
कोशिश भी की थी
कांटे तो अब भी वहीँ धंसे हैं
मगर हाथों की लकीरें
कुछ बदल सी गई हैं
Sunday, October 4, 2009
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1 comment:
khatarnaak yaar.. bahot accha likha hai..
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