आँख खुली तो सूरज सर पे आ गया था ,
रात के सपने अभी भी आंखों पे तैर रहे थे ,
सबकुछ वोही था और रोज़ की तरह वो भी नहीं था ,
रोशनदान से आती धुप परछाईं सी बना रही थी ,
परछाईं से कुछ धड़कन की सी आवाज़ें आ रही थी ,
लगता था जैसे ज़िन्दगी सितार बजा रही हो ,
शाम हुई ,धुप गई ,परछाईं भी गई ,
लगा सितार के तार टूट गए .
1 comment:
wah!wah!
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