अगर हाथ में ये कलम न होती तो
गूंगो की तरह चुप चाप नहीं देखता
मैं भी कुछ बोलता ............... शायद
कागज़ पर शब्दों को रोते देखता हूँ
क्योंकि रोते हुए चेहरों से डरता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
किसी की आंखों में आंसू आने नहीं देता
अपने आँसू से खुशी सींचता ......शायद
दुसरो की भूख में कविता नज़र आती है
दुसरो की तकलीफ में कहानी तलाशता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
कागज़ पर उन का मज़ाक नहीं उडाता
हर भूख को रोटी से मिटाता ..........शायद
चाय बेचते बच्चों को देखते हुए
दो चाय और गटक लेता हूँ
कुछ करने की चाह को जागने से पहले
कागजों के बीच सुला देता हूँ
अगर हाथ में ये कलम न होती तो
चाय में मिला उन बच्चों का भविष्य ना पीता
उन्हें अपने हाथों से पढाता .....शायद
किसी को लुट ता देख कर मुँह फेर लेता हूँ
क्रोध जिसे पालने की जरूरत है
कलम से उसका गला घोट देता हूँ
अगर हाथ में ये कलम ना होती तो
इसकी स्याही अपने ही मुँह पर नहीं मलता
हर द्रौपदी की साड़ी और लम्बी करता .....शायद
आज मैंने अपनी नपुंसकता इस कलम पर थोप दी है
और गर्व से इतराते हुए कलम भी तोड़ दी है
अब तो हाथों में वो कलम भी नहीं
कैसे ख़ुद को शब्दों के पीछे छुपाऊँगा
वो जो मुखौटा ख़ुद के लिए तैयार किया था
अब वापस नहीं बना पाऊँगा .....शायद
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1 comment:
sushant...ab tak jitna padha unme ye best hai..kitna sach hota hai tumhare likhne..ek ajeeb sa dard aur ek dar bhi hota hai...likhne me tum bahut honest ho thoughts ko kisi taraf ghumane ki koshish nahi karte..aur shabd achhe chun lete ho...i cant tell u ki hum abhi kaisa feel kar rahe hain jaise hum kitne bebas se ho...sabki tarah,tum sach me bahut achha likhte ho..waise ye to tum se bahuton ne kaha hoga..really hats off to u
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