हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले
डरता है आज आम आदमी काम पे जाने से भी
जाने किस ट्रेन के किस किस डिब्बे में बम निकले
जिस नौजवान खून पर तुम नाज़ करते हो
उन्हें फुर्सत नहीं लड़की और मोबाइल से
उनकी तो बस तमन्ना है की फ़ोन पर ही सालों का दम निकले
अपनी जहालत को छिपाने के लिए सब मुँह बंद रखते हैं
जाने किस घड़ी उनके मुँह से उनके फूटे करम निकले
आज तो दोस्तों के घर भी जाता हूँ तो सम्भल कर
जाने किसके बेडरूम से हमारा सनम निकले
ज़िन्दगी से रु ब रू होने में खतरा है गालिब
जाने जिंदा होना बस हमारा वहम निकले
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी की हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फ़िर भी कम निकले
Friday, April 3, 2009
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4 comments:
i like it!
Simply marvelous....
Loved the lines:
aaj to doston ke ghar bhi jaata hoon to smbhal kar
jaane kiske bedroom se humara sanam nikle
ghar aane se pehle missed call maarna..
tere sanam ko bhej dunga gharpe tere!!
hum bata nahi sakte how much i love this poem..isme sab kuch hai...pyar dard...dar tumhara wala gussa..aur sab itna perfectly blended hai jaise mere liye costa ka latte...superb
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