कल शाम देर से आए थे तुम
मैं नाराज़ बैठी थी
तुम चाय बनाओगे मेरे लिए
ऐसा कहा था
और फिर चाय जलने की बदबू पर
हसी थी मैं
अभी तक जला बर्तन गन्दा पड़ा है
कल रात तुमसे बातें
करते करते नींद आ गई थी मुझे
फिर तुमने मुझे डांटा था
और नाराज़ होकर कहा था
की कभी बात नहीं करोगे
फिर मैंने फिल्मों की तरह
गाना गाकर मनाया था तुम्हें
तुमने मेरे बाल खीचे थे
अभी तक दर्द हो रहा है
मेरे सोने के बाद तुमने
सिगरेट पी थी रोज़ की तरह
जला हुआ टुकडा अभी भी
छत के कोने में पड़ा है
सुबह सुबह बेसुरा गाना गाकर
तुमने मेरी नींद ख़राब की थी आज
मैंने गुस्से में तुम्हें
जले हुए ब्रेड खिलाये थे
फ़िर तुम आज भी देर से ऑफिस गए
बिना रुमाल लिए रोज़ की तरह
तुम्हारे आने का वक़्त हो रहा है
और ये TV वाले भी न
पागल हो गए हैं शायद
कल से ही हमले में मरनेवालों
में तुम्हारी तस्वीर दिखा रहे हैं
अम्मा भी कल से बेहोश पड़ी है
बाबूजी भी बताते नहीं की
उन्होंने अपने बाल क्यों मुडा लिए
अब तुम ही आकर बताओ इन्हें
की कल आए थे तुम
Monday, December 1, 2008
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3 comments:
yaar yeh awesome hai.. meine itni baar read ki hai.. aur harr baar goosebumps aa jaate hai..
I an trilled..really is kavita ka ant itna surprising tha ki it takes few seconds to realize the fact,bilkul achanak se sab badal diya tumne..simply superb
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